मौर्यवंश में वैदिक मिलावट

मौर्ययुगीन भारत में वैदिक मिलावट के आगे  ...........

अभी तक आपने मौर्य वंश की उत्त्पत्ति एवं अशोकाष्टमी के बारे में पढ़ा है की उसको कैसे अशोक से अलग किया दया और असोक को अशोक क्यों बनाया गया अब आगे देखते हैं क्या होता है लेकिन उससे पहले असोक की ये मूर्ति के बारे में जान लेते हैं। 


प्रस्तुत मूर्ति अफगानिस्तान के हड्डा क्षेत्र से मिली थी।
इसे डेविड टी. ओले ने डैलस म्यूजियम ऑफ़ आर्ट, टेक्सास को गिफ्ट किया था । मूर्ति की प्रामाणिक पहचान नही हो पाई है। अनुमान ये  है कि ये कोई दूसरे बोधिसत्त्व नहीं हैं बल्कि खुद सम्राटअसोक मौर्य हैं , जिन्होंने लिखित तौर पर अपने को बौद्ध शाक्य बताया है और येये चिंतन मुद्रा बौद्ध शाक्य असोक की है। ये सिंघासन के छोर पर वही शेर हैं जो असोक के सिंह स्तम्भ  पर हैं और ये दोन सिरे केसिंह अपने सिंघासन नाम को सार्थक करते हैं। 

अभी तक हम लोगों ने ! समय के साथ जो मिलावट की गई है और उससे जो इतिहास में फेरबदल हुआ है उसको देखा है , आप अब जान रहे होंगे की समय के साथ इस छेड़खानी में इतिहास को कैसे गुमराह किया गया है आइये अब जानने की कोशिश करते हैं कि भाषा में कैसे फेरबदल किया गया और उससे क्या प्रभाव हुआ वास्तविक मौर्य इतिहास पर !

सुना है सम्राट अशोक का एक बेटा था " महिन्द " जिसका नाम संस्कृत में " महेन्द्र " कर लिया गया है।  

सवाल यह है कि जब प्राचीनकाल में यहां के लोग हिन्द बोलते ही नहीं थे तो वे महिन्द कैसे बोलते होंगे ? उलीचते रहिये सिंध का पानी सिंध में नहीं मिलेगा हिन्द महिन्द का महेन्द्र (महा + इन्द्र ) में जैसे गलत ट्रांसफर हुआ है वैसे ही जम्बुदीप का जम्बुद्वीप में भी गलत ट्रांसफर हुआ है। 

जम्बुद्वीप तो सिंधुघाटी से लेकर आज तक कभी द्वीप था ही नहीं अर्थात टापू या चारो तरफ से जल से घिरा हुआ भू -भाग।  गाते रहिये मत्स्यमहापुराण , विष्णुपुराण , वायुपुराण की कपोल कल्पित बिना आधार की कथाएं इसके अलावा कहीं नहीं मिलेगा आपको जम्बुद्वीप !

सम्राट अशोक के सिर्फ एक पुत्र का पुरातात्विक सबूत मिलता है। उस पुत्र का नाम तीवर/ तीवल था। बाकी किसी उनके पुत्र का नाम शिलालेख में नहीं मिलता है। तीवर का नाम अपनी माँ के नाम के साथ इलाहाबाद के स्तम्भ लेख पर खुदा हआ है। तसवीर उसी स्तंभ लेख की है। 


तीवर संभवतः अशोक का तीसरा पुत्र था। इसीलए उसका नाम तीवर था। जो भी हो, यह तो तय है कि एक पिता  अपने पुत्र का नाम अच्छा - सा रखा होगा। मगर संस्कृत में तीवर का अर्थ वर्णसंकर पुत्र होता है। शायद इस अर्थ में अशोक ने अपने पुत्र का नाम नहीं रखा होगा। ये संस्कृत वालों ने तीवर का अर्थ बिगाड़ दिया है।

खैर आगे पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर बात करें तो अशोक के एक ही पुत्र का जिक्र मिलता है लेकिन ऐतिहासिक तथ्य ये बताते हैं की तीवर अशोक के तीसरे पुत्र थे तब महिंद नाम पर भी चर्चा कर लेते हैं। लेकिन महिंद नाम की चर्चा के लिए आपको अशोक के भाई के बारे में भी जानना होगा और उनका भाई प्रेम भी देखना पड़ेगा। 

श्रीलंका के एक मामूली स्तूफ के एक मामूली पत्थर पर जो अम्पारा जिले के राजमाला में स्थित है वहां ये प्रमाण मिलता है कि महिंद थेर श्रीलंका गए थे।  इसीलिए हम हजारों सालों से सुनते आये हैं कि सम्राट अशोक के पुत्र महिंद बौद्ध धम्म के सन्देश लेकर श्रीलंका गए थे। अब अगर महिंद सम्राट अशोक के पुत्र थे तब वे पाटलिपुत्र में कहां रहते थे?



सम्राट अशोक के एक छोटे भाई थे अर्हत ! घर द्वार त्याग चुके थे गुददूकूट पर रहते थे बड़ी शांत और एकांत जगह थी।  यही बुद्ध ने बिंबिसार को बौद्ध धम्म में दीक्षित किये थे।  अशोक अपने छोटे भाई से बेहद प्यार करते थे वे चाहते थे की छोटा भाई घर आये उसे खिलाएं और राजभवन में रखें मगर छोटे भाई को वहीं शांति थी उसे राजधानी पसंद नहीं थी सम्राट ने अपने छोटे भाई से कहा की पाटलिपुत्र चलो वहीं तुम्हारे लिए गुददूकूट जैसा ही कृत्रिम पर्वत बनवाये देता हूँ गुफा भी तुम्हारी शांति कोई नहीं तोड़ेगा यहीं सम्राट का आदेश हुआ और अगले ही दिनों में अपने छोटे भाई के लिए कृत्रिम पर्वत और गुफा बनवा डाले। फाहियान ने अपनी डायरी के 27 वें भाग में अशोक के इस भातृ प्रेम की दास्तान बड़े मनोयोगपूर्वक लिखी है।  गुफा का विवरण देते हुए फाहियान ने लिखा है कि यह 30 हाँथ लम्बी 20 हाँथ चौड़ी और 10 हाँथ से अधिक ऊँची थी। कोई पाँच सौ वर्षों बाद फाहियान को ये निशानियां दिखाई दी होंगी।  अपने बीटा बेटी के लिए आदमी क्या नहीं करता यदि राजा हो तो क्या कहना और उस पर भी अशोक जैसा अखण्ड भारत का सम्राट। 



तो सम्राट अशोक ने अपने भाई के लिए ये सब बनवाया और उससे आग्रह किया कि पाटलिपुत्र चलो।  मगर संतन को कहां सीकरी अर्थात संत को राजधानी से क्या लेना देना। 

ह्वेनसांग के विवरण से ज्ञांत होता है कि छोटे भाई पाटलिपुत्र नहीं आये।  तब सम्राट अशोक के पुत्र महिंद थेर उसी कृत्रिम पर्वत पर बने गुफानुमा आवास में रहने लगे थे। पाटलिपुत्र का वही पर्वत पर बने कृत्रिम गुफा आवास आजकल पटना में स्थित भिखना पहाड़ी नामक मोहल्ला है।  भिखना पहाड़ी का मतलब हुआ " भिक्खु की पहाड़ी "

फ़िलहाल यहां अब बड़े बड़े पत्थर बिखरे पड़े हैं ईंटों का मलवा है।  पहाड़ी के उत्तरी - पूर्वी कोने पर मठ है।  मठ में जिसे पूजा जाता है उसे लोग " भिखना कुँवर " कहते हैं।  भिखना कुँवर अर्थात वही राजकुमार महिंद। अशोक के राजमहल से ये उत्तर की ओर है  बगल में कोई दो किलोमीटर की दूरी पर गंगा के किनारे महेंदु घाट है आसपास महेंदु मोहल्ला फैला हुआ है महेंदु मोहल्ला कुँवर महिंद थेर की स्मृति कराता है। 

कुछ और भी पारिवारिक सदस्यों के साक्ष्य हैं !

मध्यप्रदेश के सिहोर जिले में पानगुरिया बौद्ध विहार है।  पानगुरिया में अशोक के दो शिलालेख और एक यष्टि लेख है।  पहली तस्वीर अशोक के शिलालेख की है और दूसरी यष्टि लेख की ........

यष्टि लेख पर अशोक की बेटी संघमित्रा द्वारा दान दिए जाने का विवरण है जिसमे संघमित्रा का पुरातात्विक ऐतिहासिक पुष्टि होती है।  अशोक के शिलालेख पर एक जो महत्वपूर्ण बात लिखी है वह यह है कि राजा जो पियदसिन नाम से जाने जाते थे एक बार उपुनीथ विहार की तब यात्रा की , जब कुमार सम्व  की मनेम देश की प्रशासनिक जिम्मेवारी थी।  कुमार सम्व संभवतः अशोक के परिवार के जान पड़ते हैं और मनेम देश सिहोर का इलाका रहा होगा , आसपास में कई शैलाश्रय हैं ! शैलाश्रय बौद्ध भिक्षुओं के आवास और साधन स्थल थे।  स्थानी भाषा में इसे सारू - मारु की कोठरी बोलते हैं।  इसके आसपास छोटे छोटे कई स्तूफ़ भी हैं।  अंतिम तस्वीर अशोक के शिलालेख का लिपि - रेखांकन है जिसमे लिखा है -

"पियदसिनामराजा कुमार सम्व मानेम देसे उपुनीथ विहार याताया "


 आइये अब अशोक की पत्नी के नाम को भी जान लेते हैं --

इतिहासकारों को गौतम बुद्ध की माँ का नाम लुमिनी और अशोक की पत्नी का वास्तविक नाम कालुवकि मान लेना चाहिए , जिसके अभिलेखीय प्रमाण हैं। 

लुमिनी और कालुवकि जैसे नाम गैर - आर्यमूलक हैं शायद इसीलिए इतिहासकार ऐसे नामों से बचते आये हैं तथा महामाया और तिष्यरक्षिता जैसे आर्यमूलक नाम उन पर भारी पड़ते हैं।  तिष्यरक्षिता पर तो बड़े बड़े इतिहासकारों ने कलम चलाई है मगर बेचारी कालुवकि उपेक्षित रहीं।  वह कालुवकि जिसके अभिलेख की गरिमा को देखते हुए समुद्रगुप्त और जहांगीर जैसे राजाओं ने अपना - अपना अभिलेख इसी रानी के अभिलेख पर खुदवाया है। 

नाम में भी कुछ रखा है !

अपनी जिस रानी का नाम सम्राट अशोक ने स्वर्णाक्षरों में पत्थरों पर ( कौशाम्बी अभिलेख ) लिखवाया है जिस रानी की याद में आज भी पटना में रानीघाट है , वह रानी कालुवकि थीं जिस पर आज तक कोई भी साहित्यकार ने कलम नहीं चलाई है। 

कालुवकि के रानी शिलालेख पर लिखा है कि 

"देवानंपियषा वचनेना सवत महमता वतविया ए हेता दुितयाये देवीये दाने अंबावडिका वा आलमे व दानगहे व ए वा पि अंने किछि गनीयति  ताये देविये षे नानि हेवं ... न ... दुतियाये देविये ति तीवलमातु कालुवाकिये" । 

इस शिलालेख में  सम्राट अशोक ने अपनी दूसरी रानी तिवलमाता कालुवकि के इस प्रार्थना को पूरी करने का महामात्य को आदेश देते हैं कि रानी जो भी आम्र - वाटिका, आराम, दानगृह या अन्य जो भी दान देती हैं, वे सभी उनके नाम में अंकित करें।  अशोक के पुरातत्व में इसी पुत्र का नाम मिलता है। 



जिस रानी का कोई पुरातात्विक सबूत नहीं वह रानी तिष्यरक्षिता है जिस पर आज तक ना जाने कितने नाटक - कहानियां एवं अन्य साहित्य लिखे गए हैं। 

काश ! कालुवकि का नाम ऋचा , श्रद्धा या कुछ और ऐसा ही आर्यवादी होता !

 अब शायद समझ में आ रहा होगा कि क्यों गौतम की पत्नी का असली नाम कच्चाना साहित्य से गायब है और बाद में दिया हुआ नाम यशोधरा विख्यात है। 

आखिर कच्चाना कालुवकि जैसे नाम किस ओर संकेत करते हैं ? 


(खैर अब इन संकेतों को समझिये कि नामों में क्या रखा है तब तक थोड़ा विराम लेकर आगे के लेख में बात करेंगे मौर्यकाल के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति की जिसका नाम आप सबको मौर्य सम्राटों का नाम लेने से पहले ही याद आ जाता है और ऐसा क्यों है और क्यों किया गया है ये भी पता चल जायेगा बाकी आप सभी से यही गुजारिश है की अगर इतिहास की सच्चाई का आभास हो रहा हो तो हमारे लेखों को आगे भी पहुचायें शेयर करें ताकि सभी भारत के मूलनिवासी अपने इतिहास की सच्चाई से रुबरु हों और पढ़ने का प्रयास करें धन्यबाद ) 



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