बुद्ध और भारत III

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वैदिक युग चकाचौंध का मारा। 

क्या जाने इतिहास बेचारा ।। 

सिंधु घाटी की खुदाई  (2014) से प्राप्त हड़प्पा डॉट कॉम पर मौजूद ये तस्वीर स्तूफ नहीं  वल्कि स्तूफ़ ही है !


तू कहता कागद की लेखी। 

मैं कहता आँखिन की देखी।। 

कबीर की दृष्टि अपनाइये , ये  आँखों से देखने की चीज है। 


स्वपन कुमार विस्वास की किताब बौद्ध धर्म : मोहनजोदड़ो हड़प्पा नगरों का धर्म अगर पढ़ेंगे तो उसमे विस्तार से बताया गया है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के नगरों में बौद्ध स्तूफ़ मिले हैं। ये सभी बौद्ध स्तूफ़ हड़प्पा कालीन हैं। हड़प्पा मोहनजोदड़ो के स्तूफ़ों में लगी हुई ईंटे , निर्माण की शैली , स्तूफ़ में मिले बर्तन और बर्तनों पर की गई चित्रकारी तक सभी कुछ हड़प्पा युगीन है।  हड़प्पा युगीन इसलिए भी कि बौद्ध स्तूफ़ों के नीचे कोई अन्य आधारभूत संरचना भी नहीं मिलती है की यह कहा जा सके कि इसका निर्माण बाद में हुआ है। 

1826 में मैसन ने पहली बार हड़प्पा में स्तूफ़ ही देखा था , बर्नेस (1831) और कनिंघम (1853) ने भी। सिंधुघाटी सभ्यता की खुदाई बाद में हुई।  राखालदास बंदोपाध्याय ने भी 1922 में मोहनजोदड़ो के बौद्ध स्तूफ़ की खुदाई में सिंधुघाटी सभ्यता की खोज की थी। 

राखीगढ़ तो हाल की ही घटना है वहां भी सिंधुघाटी सभ्यता स्तूफ़ की खुदाई में ही मिली - सिंधुघाटी सभ्यता का विशाल स्थल राखीगढ़ ! इसलिए सिंधुघाटी सभ्यता की खुदाई में स्तूफ़ नहीं बल्कि स्तूफ़ों की खुदाई में सिंधुघाटी सभ्यता मिली है। मगर इतिहासकारों को सिंधुघाटी की सभ्यता के इतिहास को ऐसे लिखे जाने में पता नहीं क्या परेशानी है जबकि सच यही है। 

भाई ! महाराष्ट्र के दायमाबाद से रथ चलाते मनुष्य की एक ताबें की मूर्ति मिल गई है।  ताबें का अविष्कार पहले हुआ और कांसा का बाद में कांसा तो ताबें के संग जस्ता है।  सिंधुघाटी की कांस्य युगीन सभ्यता से कम पुरानी नहीं है दायमाबाद ली ताम्रपाषण सभ्यता ! फिर रथ पर कैसे आये थे आर्य ? रथ तो दायमाबाद में मिला है , आर्यों से पहले  ये तो आप ही बताइये कि राम के पिता दशरथ कैसे दस रथों पर सवार होते थे ? मगर तुलसीदास ने तो लिखा है कि राम और रावण की लड़ाई में राम रथविहीन थे और रावण महाराज रथ पर थे। 


मैं ये कह रहा हूँ की बौद्ध सभ्यता कांस्य युगीन है , इतिहासकार गलती से उसे छठी ई ० पू ० में रखते हैं , छठी ई ० पू ० तो लौह युग है। श्रावस्ती नालंदा में कांस्य उपकरण मिलते हैं , ये बौद्ध स्थल हैं।  बौद्धों के कांसाय वस्त्र कांसे के रंग के होते थे जिसे गलती से गेरुआ मान लिया गया है , पूरे के पूरे बौद्ध भिक्षु कांस्य रंग के वस्त्रों में रंगे हुए थे।  बड़े पैमाने पर कसेरे भी बौद्ध सभ्यता में थे।  मगर इतिहासकार बताते है कि पूर्वी भारत में कांस्य युग आया ही नहीं , वे मानते है की पूर्वी भारत में ताम्रयुग के बाद सीधे लौह युग आ गया।  परिणामतः बौद्ध सभ्यता को वे छठवीं शताब्दी ई ० पू ० में खींच लाते हैं , उधर पश्चिमोत्तर भारत में इतिहासकार कांस्य युग के रूप में हड़प्पा सभ्यता को मानते हैं मगर पूर्वी भारत में कांस्य युग के रूप में बौद्ध सभ्यता को नहीं मानते हैं। 

वो गलत हैं और अपनी गलती में सुधार करें ! यदि इतिहासकार मान लें की बौद्ध सभ्यता कांस्य युगीन है तो बौद्ध सभ्यता स्वतः सिंधुघाटी सभ्यता के समकालीन हो जाएगी। 

मोहनजोदड़ो की खुदाई में विशाल स्नानागार मिला है।  स्नानागार के आँगन में जलाशय है , जलाशय के तीन ओर बरामदे और उनके पीछे कमरे हैं।  इतिहासकार मैके बताते है कि कमरे वाला स्नानागार पुरोहितों के लिए था जबकि विशाल स्नानागार सामान्य जनता के लिए था तथा उसका उपयोग धार्मिक समारोहों के अवसर पर किया जाता था। 

डी डी कोसंबी ने लिखा है कि पूरे ऐतिहासिक युग में ऐसे कृत्रिम ताल बनाये गए थे - पहले स्वतंत्र रूप से बाद में मंदिरों के समीप। 

सवाल उठता है की सिंधुघाटी के लोग विशेष धार्मिक अवसरों पर विशाल स्नानागार में पुरोहितों के संग स्नान तथा शुद्धिकरण करके कहां जाते थे ? मंदिर तो थे नहीं ? फिर वही स्तूफ़ में ! स्नानागार के बगल में स्तूफ़ में। 

उत्तरी बिहार के वैशाली में पुरातत्वविदों ने आनंद स्तूफ़ के बगल में ठीक ऐसा ही एक विशाल स्नानागार खोज निकाला है जैसा कि मोहनजोदड़ो में है !


मोहनजोदड़ो के जलकुण्ड में उतरने के लिए सीढ़ियां हैं और उनके पीछे कमरे बने थे।  वाराणसी के जलकुण्ड में भी उतरने के लिए सीढ़ियां हैं और उनके पीछे कमरे बने हैं जैसे मोहनजोदड़ो के जलकुण्ड में स्नान कर लोग बौद्ध स्तूफ़ जाया करते थे , वैसे ही वाराणसी के जलकुण्ड में भी स्नान कर लोग दुर्गा मंदिर जाया करते हैं। 

पहला बौद्ध सभ्यता का प्रतीक है जिसके साक्ष्य हैं , दूसरा ब्राह्मण सभ्यता का प्रतीक है जिसका कोई साक्ष्य नहीं है। कोई शक नहीं कि सिंधुघाटी सभ्यता बौद्ध सभ्यता ही थी। 


सिंधुघाटी के हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे नगरों के नाम बाद में कृत्रिम ढंग से गढ़े गए हैं खुद सिंधु क्षेत्र भी इसी कृत्रिमता का शिकार हुआ है जैसा की हम जानते हैं की हड़प्पा का नाम ऋगवेद की एक पारिभाषिक शब्दावली " हरियूपिया " के आधार पर गढ़ा गया है और मोहनजोदड़ो को "मुअन -जो -दड़ो " (मुर्दों का टीला) भी उन लोगों ने कहा जो उस नगर की विनाश लीला के बाद में आये तभी तो उन्होंने इसका नाम मुर्दों का टीला (मुअन - जो - दड़ो ) रखा फिर मुअन जो दड़ो को भी मोहनजोदड़ो में तब्दील करने वाले वे लोग हैं जो शिव , कृष्ण या कामदेव के जैसे मोहक नामों पर विश्वास करते हैं। 

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे नगरों का वास्तविक नाम क्या था ? हमें नहीं पता मगर सिंधु क्षेत्र का प्राचीन नाम मेंल्लुख़ था यह हमें पता है। 2350 ई ० पू ० के आसपास और उसके आगे भी मेसोपोटामियां अभिलेखों में सिंधु क्षेत्र का प्राचीन नाम मेंल्लुख़ मिलता है।  मेसोपोटामियाई साहित्य भी इसकी पुष्टि करता है।  द्रविड़ भाषाओँ में "मेलु" का अर्थ होता है "श्रेष्ठ जन" और "ख्ख" का अर्थ होता है "क्षेत्र" ! तो "मेंल्लुख़" का अर्थ हुआ - "श्रेष्ठ जनों का क्षेत्र" या देश।  कन्नड़ में "श्रेष्ठ" को "मेलु" कहा जाता है और इन्ही द्रविड़ों के वंशज हैं "उरांव" लोग जिनकी भाषा है "कुडुख"।  कुडुख में क्षेत्र का बोधक शब्द है "ख्ख" जैसा कि  हम भूमि बोधक "ख़ेख़ेल" , "खज्ज" , "खल्ल"  "खइका"  जैसे कुडुख शब्दों में देखते हैं।    

हाँ तो मैं कह रहा था कि मोहनजोदड़ो  'मुर्दों का टीला' सिंधी भाषा का शब्द है जाहिर है कि ये नाम मोहनजोदड़ो नगर की बर्बादी के बाद पड़ा है तब मोहनजोदड़ो का वास्तविक नाम क्या था ? हमें नहीं पता।  मगर मुर्दों का टीला तो उसके बिध्वंश के बाद ही कहा गया होगा।  हड़प्पा का अर्थ वहां की स्थानीय भाषा से हमें प्राप्त नहीं होता है स्थानवाचक नामों में "पा" जोड़ने की परंपरा आष्ट्रिकों की भाषा में  है। "हो" भाषा का अध्ययन इस दृष्टिकोण से रोचक होगा सिर्फ "रजप्पा " में ही नहीं "जियारप्पा" आदि जैसे आष्ट्रिक गाँव नगरों के नामों में भी "पा " जुड़ा हुआ मिलता है ! कहीं हड़प्पा द्रविड़ों से पहले का तो नगर नहीं है न ? क्यूंकि द्रविड़ों से पहले थे आष्ट्रिक !

जनता को पहले से ही खबर थी , इतिहास बेखबर था।  मोहनजोदड़ो की खबर आधुनिक युग में चाहे जिसने भी ली हो वहां की जनता पहले से ही जानती थी कि यहां बड़े पैमाने पर मरे हुए लोग दफ़न हैं तभी तो उसे "मुअन-जो -दड़ो " अर्थात मुर्दों का टीला कहा करती थी। 

खैर हड़प्पा मोहनजोदड़ो का पहले  A B C जो भी नाम रहा हो , सिंधु की भव्य सभ्यता तो थी यह सिद्ध है।  उसका दूसरे नाम से ही सही वर्णन तो होना चाहिए।  मगर भारतीय साहित्य में 20 वीं सदी से पहले कुछ भी वर्णन नहीं है ! पाणिनि महोदय आप तो उधर के ही थे , आपने क्यों नहीं लिखा ? रही बात बौद्ध साहित्य की तो सबने सुना है कि बड़े पैमाने पर पुस्तकें जलाई गई थीं ऐसा की धुआं तीन महीने तक उठता रहा किसकी थी इतनी सारी किताबें ! किसने लिखी थीं ? क्या लिखा था ? हो सकता है कि उनमे सिंधु घाटी और उसकी सभ्यता का विराट वर्णन हो ? हो सकता नहीं ऐसा ही हुआ। बौद्ध बिहारों में रखी  हुई वे किताबें जो बौद्ध भिक्षुओं द्वारा लिखी गई थी किसका इतिहास लिखेगी ? जाहिर है अपने से पूर्व की ओर का ही। 

नालंदा सभी लोग जानते हैं ! जम्मू कश्मीर के अंबारा में मिला है नालंदा से भी बड़ा बौद्ध महाविहार , सबसे पहले मिला बड़ा बौद्ध महाविहार नालंदा , तब  मिला नालंदा से  भी बड़ा बौद्ध महाविहार तेल्हाड़ा  और अब  मिला है तेल्हाड़ा से भी बड़ा बौद्ध महाविहार अंबारा ! उफ़ उफ़ एक से बड़ा एक बौद्ध महाविहार आप लोग कितने बौद्ध शिक्षा केन्द्र खोले थे बौद्ध भिक्षुओं ? जरा नाम पर ध्यान दीजिये  अंबारा मतलब अंबाराम ! भारत में जिस शहर का जिस गाँव का जिस टीले के नाम में "आराम " जुड़ा हो समझिये वहां बौद्ध शिक्षा केन्द्र था।  " आराम " का मतलब ही होता है बौद्ध महाविहार, और फिर इतने बड़े बड़े महाविहारों और शिक्षा केन्द्रों में रखी गई वो किताबें किसका वर्णन करती होंगी ? और क्यों जलाया गया होगा ? किसका ज्ञान और इतिहास मिटाने को जलाया गया ? इसीलिए खोद कर तो देखिये। 



आश्चर्य है कि २० वीं सदी से पहले भारत या संसार की किसी भी पुस्तक में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे वास्तविक ऐतिहासिक और भव्य नगरों का कहीं उल्लेख नहीं है।  वेद पुराण और अर्थशास्त्र की तमाम पुस्तकों से लेकर पूरा पालि साहित्य और जैन साहित्य तक हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे वास्तविक नगरों से ऐसे अनभिज्ञ हैं मानो उनका दुनिया में कोई अस्तित्व ही न हो !

पाणिनि , पतंजलि , भारवी , भवभूति से लेकर माघ और बाणभट्ट सभी चुप हैं।  बिल्हण , कलहण और हेमचन्द्र तक के ऐतिहासिक ग्रंथों में भी इन नगरों को लेकर सन्नाटा फैला हुआ है।  भारत के प्राचीन साहित्य और ऐतिहासिक ग्रंथों में तो कई काल्पनिक एवं मनगढंत या कहें कि सोने चांदी के नगरों का वर्णन है किन्तु वास्तविक और ऐतिहासिक नगर हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सिरे से गायब हैं। 

मैं यहाँ किसी धर्म और सभ्यता का प्रचार नहीं कर रहा हूँ वल्कि ये बताने की कोशिश कर रहा हूँ की जिस सभ्यता से भारत में आधुनिकता का उदय हुआ जिसने मानव को ज्ञान दिया रहन सहन दिया समाज दिया हम आज उस सिंधुघाटी सभ्यता और बौद्ध सभ्यता को कितना जानते हैं जिसका प्रमाण भारत और विश्व का इतिहास और पुरातत्व साक्ष्य चीख चीख कर अपने अस्तित्व की गवाही दे रहे हैं, और एक आज का भारत है जो काल्पनिक और चोरी किये हुए वैदिक साहित्य और सभ्यता को बड़े चाव और श्रद्धा से सच माने जा रहा है। 


( Note :- अभी के लिए थोड़ा सा विराम लेते हैं लेकिन पिछले ब्लॉग में आगे के लिए समय थोड़ा अधिक लग गया था लेकिन अब आगे का इतिहास बहुत जल्द ही या कहें तो लगातार आप तक पहुंचेगा जब तक सिंधुघाटी बौद्ध सभ्यता का पूरा इतिहास जो आप तक पहुंचाना है वो पहुँच नहीं जाता  बाकी  Source of History उन्ही किताबों से है जिनसे शुरुआत हुई थी , मकसद ये है की वे सभी जानकारी इकट्ठी करके एक ही जगह पर आपको सरलता से मिले और समझने में आसानी रहे )


 

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