बुद्ध और भारत IV

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लिखी और कही हुई बातों को मान लेने का नाम श्रद्धा है। 

लिखी और कही हुई बातों को जान लेने का नाम ज्ञान है।। 

             "संसार में पाषाण युग और ताम्र युग से लेकर विज्ञान युग तक की मानव सभ्यता उत्तरोत्तर सभ्य होने का इतिहास है।" यह कौन सी सभ्यता है वेदों की जिसमे सतयुग और द्वापर युग से लेकर कलियुग तक की सभ्यता  उत्तरोत्तर असभ्य होने का इतिहास है ? ये तो कमाल के ग्रन्थ हैं ! 

प्रत्येक प्राचीन सभ्यता की अपनी लिपि है। 

               सुमेरी सभ्यता की कीलाक्षर लिपि , साइप्रस सभ्यता की लाइनियर लिपि , फिनोशियन सभ्यता की फिनोशियन लिपि से लेकर मिश्र की होरोग्लाइपिक लिपि और बौद्ध सभ्यता की धम्म लिपि तक।  मगर भारत की प्राचीन कही जाने वाली वैदिक सभ्यता की कोई लिपि नहीं है यह इतिहासकारों को हैरत में डाल देने वाली घटना है। सिंधु संस्कृत का शब्द है और संस्कृत संस्कार की हुई भाषा है।  आप बताइये की संस्कृत ने "सिंधु " के निर्माण के लिए किस शब्द का संस्कार किया है ? इसका उत्तर स्पष्ट है की संस्कृत ने हिंदु का संस्कार करके सिंधु बनाया है।  अभिलेख प्रमाण के आधार पर हिंदु प्राचीन शब्द है सिंधु प्राचीन शब्द नहीं है।  हिंदु का प्राचीनतम उल्लेख इसा से कोई 500 साल पहले फारस के राजा दारा महान के अभिलेखों में मिलता है जबकि सिंधु शब्द का प्राचीन अभिलेखों में सिरे से गायब है।  

                  निष्कर्ष यह है कि हिंदु का संस्कारित रूप संस्कृत में सिंधु है इसीलिए हिंदु से सिंधु का विकास हुआ है सिंधु से हिंदु का विकास नहीं हुआ है,आप उल्टा ना पढ़िए ना पढ़ाइये।  भारत का पवित्र भाषा विज्ञान चाहे जो भी कहे पुरातत्व तो यही बताता है कि हिंदु शब्द पुराना है सिंधु शब्द बाद का है हिंदु से कोई सैकड़ो साल बाद किसी अभिलेख में सिंधु शब्द का प्रयोग मिलता है।  हिंदुकुश पर्वत नाम ऐसे ही थोड़े न है ? मगर सिंधु शब्द को बाद का मान लेने पर पूरा का पूरा ऋगवेद की प्राचीनता धराशायी हो जाती है।  कारण की ऋगवेद की पूरी कथा सिंधु के कूल - कछारों पर सिंधु की स्याही से लिखी गई है ऐसा की उसकी तुमुल तरंगो का दृश्य आँखों के सामने हो जाता है।  ऋगवेद की प्रमुख नदी है सिंधु, उसमे बार बार उल्लेख है।  ऋगवेद को पुराना बताने के लिए ही कहा जाता है की सिंधु से हिन्दू का विकास हुआ है।  यदि कोई कहे की हिंदु से सिंधु का विकास हुआ है तो ऋगवेद बहुत बाद का साबित हो जायेगा इसीलिए वेदवादी लोग इसका विरोध करते हैं। 

                 डा ० बच्चन सिंह ने तो लिखा है की आश्चर्य नहीं , आर्यों ने हिंदु को सिंधु कर दिया।  आश्चर्य इसलिए भी नहीं की सिंधु गुप्तकाल से पहले किसी अभिलेख में मिलता ही नहीं।  अब आप ऋगवेद का काल तय कर लीजिये 1965 में  शुंगकाल का अम्बाला के सुघ से मिटटी का खिलौना मिला है एक बालक गोद में तख्ती लिए बाराखड़ी सीख रहा है तख्ती पर वह अ आ ई से लेकर अं अः तक कुल 12 स्वराक्षर लिख रहा है , जिन्हे उसने चार बार दोहराया है।  बहरहाल हरियाणा जिले में मिला यह खिलौना दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में है। लिपि वैज्ञानिकों ने इसी आधार पर बताया है की ब्राह्मी वर्णमाला में शुंगकाल से पहले "ऋ" स्वराक्षर था ही नहीं अन्यत्र भी नहीं मिलता है। "ऋ" संस्कृत की विशिष्ट ध्वनि है।  जब शुंगकाल तक "ऋ" का लेखन अस्तित्व में नहीं था , तब ऋगवेद , ऋषि , ऋत्विज से जुड़ी शब्दावली भी लेखन में नहीं थी । अब आप कह सकते हैं की "ऋ"  मौखिक रही होगी , मगर आप सिर्फ ऋ को मौखिक कैसे मानियेगा जबकि उससे पहले हड़प्पाई लेखन के लगभग 4000 नमूने हैं , अशोक के अनेक अभिलेख उपलब्ध हैं , शेष स्वर-व्यंजन मौजूद हैं।  आपको थक हारकर ये मानना ही होगा की ऋ से जुड़ी सारी  सामग्री जैसे ऋगवेद , ऋषि और संस्कृत शुंगकाल से पहले की नहीं हैं बाद की हैं। 

                भारत में मूलनिवासी आंदोलन का आदिम स्तोत्र भाषा - प्रजाति की संकल्पना ही है और  ऐसे वैज्ञानिक तथा ठोस तथ्यों पर आधारित संकल्पना को आर्यवादी इतिहासकार , भाषा वैज्ञानिक एवं नृवंशवैज्ञानी इसीलिए नेस्तनाबूत कर रहे हैं की मूलनिवासी की अवधारणा जड़ से ख़त्म हो जाये।  न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। भारत के सिर्फ मिश्रित तत्वों और बाह्य चोचला की चोंच में चोंच मिलाकर भाषा प्रजाति की पुख्ता अवधारणा को ख़ारिज करने वाले इतिहासकारों , भाषावैज्ञानिकों एवं नृवंशवैज्ञानिकों से मूलनिवासियों को सावधान रहना होगा। 

                हिंदी के मुहाबरों में छिपा होता है इतिहास या पुरातत्व का खजाना।  भोजपुरी जनपद से लेकर अंग प्रदेश और मगध क्षेत्र तक खूब प्रचलित है यह मुहाबरा कि " तेल्हाड़ा में चले जाओगे तो बर्बाद हो जाओगे ". ये तेल्हाड़ा क्या है भाई ? बौद्धों के प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय से 40 किलोमीटर दूर और नालंदा से भी पुराना है तेल्हाड़ा का बौद्ध विश्वविद्यालय।  2009 से यहाँ रुक रुककर चल रही है खुदाई ! मिली है यहाँ से धम्म लिपि में लिखी हुई मुहरें और ईंटों से बने विश्वविद्यालय के विशाल खण्डहर।  भारत में ब्राह्मण संस्कृति और बौद्ध संस्कृति के आपसी टकराव का नतीजा है "तेल्हाड़ा में चले जाना" ब्राह्मण संस्कति की नजर में तेल्हाड़ा के बौद्ध विश्वविद्यालय में जाकर बौद्ध संस्कृति में ढलना एक प्रकार से बर्बाद हो जाना है। इसलिए तेल्हाड़ा में चले जाओगे का मतलब होता है बर्बाद हो जाओगे। तेल्हाड़ा का गौरवशाली इतिहास और पुरातत्व के बारे में तो विस्तृत जानकारी इतिहासकारों को 2014 तक में मिली , किन्तु हिंदी मुहाबरा तो न जाने कितने सालों से इसके इतिहास को अपनी कोख में लिए घूम रहा है। 

                   भारत में श्रमशील जातियों का इतिहास पुराना है और दूसरों के श्रम पर जीवित रहने वाली जातियों का इतिहास बाद का है।  गंडासा , हस्तकुठार विदारणी से लेकर खुरचनी एवं वेधनी जैसे श्रम के औजार पाषाणकाल में मिलते हैं - धरती के ऊपर , गुफाओं में दबे हुए या प्राचीन नदी निक्षेपों के साथ साथ।  उत्तर पाषाणकाल में श्रम औजार और भी विकसित हुए जैसे छेनियाँ , हथौड़े , चाकू , मूसल आदि।  मध्यपाषाणकाल में मवेशियों और भेंड़ बकरियों के पालन का साक्ष्य प्राप्त होता है।  भारत की श्रमशील जातियों ने सैकड़ों छोटी बड़ी खोजें की हैं, खेती का अविष्कार हुआ , अग्नि की खोज हुई और मशाले जलीं।  मानव सभ्यता ने अंधकार से प्रकाश में छलांग लगाई। 

सिंधुघाटी सभ्यता में मिलता है कहीं से भी यज्ञ -मंडप, यज्ञ-वेदियां , मंदिर , घण्टे तथा ब्राह्मणवादी कार्यों के साधन या औजार ? कुछ नहीं मिलता और न ही मिलेगा ! क्यूंकि कल्पनाओं का अस्तित्व नहीं होता। 


                    किसी सज्जन ने वाया नागवंशीय जितु माने की हड़प्पा सभ्यता के उत्खनन से प्राप्त धातु पट्टिका को दिखाया है , जिस पर राम - लक्ष्मण एवं सीता सहित हनुमान मुद्रित हैं।  भाई साहब ! बाद की धातु पट्टिका पर सिंधु लिपि तो जैसे तैसे किसी तकनीक से आपने जोड़ दी है , लेकिन भूल गए की राम - लक्ष्मण और सीता की ललाट पर लगे त्रि-रेखित तिलक सहित सिर पर जो मुकुट है वह मुगलकालीन रामलीला का मुकुट है ऐसा मुकुट सिंधुघाटी की सभ्यता से लेकर मौर्यकाल , कुषाणकाल और गुप्तकाल तक कही नहीं मिलता है।  तो अगली बार थोड़ा तैयारी  करके कोई उदाहरण दीजिये। 


                      सिंधुघाटी के पुजारी शासक से लेकर सम्राट अशोक , कनिष्क , रुद्रादमन और समुद्रगुप्त तक की पुरातात्विक तस्वीरें उपलब्ध हैं किसी के सर पर ऐसा मुकुट है क्या ? सबको छोड़िये स्वयं राम की भी जो पुरानी तस्वीरें मिलती हैं उनमे भी ऐसा मुकुट नहीं है।  प्राचीन इतिहास और पुरातत्व के सारे साक्ष्य बताते हैं की अयोध्या कभी ब्राह्मणों हिन्दुओं की नहीं थी।  वह पूरी तरह बौद्ध नगरी थी।  (सन्दर्भ : स्त्री-दलित और जातिय दंश, पृ ० 72 ) 


भारतीय परिप्रेक्ष्य में आर्यों का प्रतीक चिन्ह नहीं है " स्वास्तिक" !

पूरे वैदिक साहित्य में कहीं नहीं है "स्वास्तिक" न चिन्ह ना शब्द !

यकीन कीजिये स्वास्तिक का चिन्ह सिंधुघाटी सभ्यता का है।  सिंधुघाटी सभ्यता में ये रहा स्वास्तिक का चिन्ह।  ध्यान से देखिये आराम से देखिये।  



अभी जल्द में एक प्रशंग पढ़ा !

एक ब्राह्मण ने बुद्ध से पूँछा कि गया में स्नान करने से पापों को धोया जा सकता है ? बुद्ध ने उत्तर दिया की यदि आप में कोई दोष नहीं है तो कोई भी जल आपके लिए गया है।  भला बताइये बुद्ध के समय में "गया" नाम की क्या कोई जगह थी ? बुद्ध गया थोड़े न गए थे ? कही लिखा है की बुद्ध के समय में "गया" नाम की जगह थी और वो गया गए थे ? वे तो उरुवेला गए थे।  बौद्ध साहित्य में ब्राह्मण साहित्य की खूब मिलावट की गई है। 

एक पुस्तक है - "गया और बुद्ध गया " (1931 -34 का अंग्रेजी पुनर्मुद्रण ; 1975 ) लेखक हैं - डा ० बेनीमाधव बरुआ (1888 -1948 ) डा ० बरुआ चटगाँव जिले के थे और पालि में कोलकाता से एम ए थे।  डा ० बरुआ ने कीलहार्न द्वारा सम्पादित पाल वंश के राजा नयपाल (1035 -53 ) का शिलालेख (1040 ई ० ) के सन्दर्भ में बताया है कि गया के ब्राह्मण तीर्थस्थल 11 वीं सदी के बाद के हैं।  यदि डा ० बरुआ की बात पर यकीन किया जाये तो आप कह सकते हैं कि जब गया के ब्राह्मण तीर्थस्थल 11 वीं सदी के बाद के हैं तब गया के ब्राह्मण तीर्थस्थल पर विस्तार से जिन ग्रंथों में लिखा गया है वे 11 वीं सदी के बाद के ही साबित होते हैं।  मिसाल के तौर पर पदम् -पुराण , गरुण -पुराण , नारद -पुराण आदि में गया तीर्थस्थल के बारे में विस्तृत वर्णन है अतः  ग्रन्थ 11 वीं सदी के  हैं।  और आश्चर्य है की नयपाल के इसी शिलालेख में गया के प्रथम ब्राह्मण तीर्थस्थल मानससर सहित मंदिर के निर्माण किये जाने की बात कही गई है।  

सोचिए जब गया का प्रथम ब्राह्मण तीर्थस्थल 11 वीं सदी में बना तब वहां के अन्य ब्राह्मण तीर्थस्थल कब बने होंगे ?


(अभी के लिए आपको इस सवाल के साथ छोड़ते है और क्या क्या मिलावट हुई है बौद्ध सभ्यता और साहित्य में , वेदों के लेखकों के द्वारा उस पर चर्चा अगले ब्लॉग में बहुत जल्दी ही तब तक सवाल इकट्ठे करते रहिये......उत्तर जल्दी मिलेंगे)



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