बुद्ध और भारत II
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"अज्ञानी व्यक्ति एक बैल के समान है। वो ज्ञान में नहीं, सिर्फ आकार में बढ़ता है !"
अब जरा विचार कीजिये कि ऋगवेद का ये गौतम राहुगण कौन है ? जी हाँ राहुल के पिता गौतम ही तो हैं। ऋगवेद का गौतम राहुगण पूर्वी भारत में आर्य संस्कृति का प्रचार करते हैं जबकि राहुल के पिता गौतम पूर्वी भारत में बौद्ध संस्कृति का प्रचार करते हैं। यही बात एच ब्रून हॉपर के सुझाव पर इतिहासकार जी ह्वेंसिंग भी कहते हैं कि ऋगवेद में वर्णित राजा कनित पृथुश्रव वास्तव में राजा कनिष्क हैं। अरे इतना भी क्या कॉपी करना की नाम और जगह भी एक ही रखे।
गौतम से बुद्ध होने के लिए वेदों का विरोध जरुरी नहीं है मगर पूरा वेद साहित्य बुद्ध के विरोध में खड़ा है। क्यों भाई ?
( गौतम राहुगण का सन्दर्भ : हिम्स ऑफ़ दी ऋगवेद : ग्रिफिथ वॉल्यूम -1 , मंत्र 94 -82 / कनित पृथुश्रव का सन्दर्भ : मंत्र 8 , 46 , 21 )
इतिहासकार एस के विस्वास भी याद दिलाया है की बुद्ध अपने वस्त्र को बाएं कंधे पर रखते थे ,जबकि दायां कंधा मुक्त होता था। यह पोशाक विन्यास मोहनजोदड़ो की है। ब्राह्मण देवी देवताओ की मूर्तियों में वस्त्र से अधिक आभूषण और खतरनाक हथियार मिलते हैं। ऐसा क्यों है विचार कीजियेगा आभूषण और हथियार ज्ञान का तो कतई प्रतीक नहीं हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त एक मुहर पर तीन मुखों वाले एक नर देवता का चित्र अंकित है। इस मुहर के बारे में आर सी मजूमदार , एच सी चौधरी एवं के के दत्त जैसे चोटी के इतिहासकारों ने लिखा है कि चित्र पर अंकित चारो ओर पशुओं की मूर्तियां शिव के पशुपतिनाथ को सार्थक करती हैं ! मगर ऐसा है नहीं। पशु का मतलब जानवर पहले थोड़े न होता था। पशु का सम्बन्ध पाश ( बन्धन ) से है। पाश ( मोह ) से मनुष्य भी बंधा है और पाश ( रस्सी ) से जानवर भी बंधा है इसलिए पशु का वास्तविक अर्थ जीव है। मगर इतिहासकार क्या जाने भाषा का मर्म , वह तो पशुओं से घिरा देखकर पशुपतिनाथ नाम दे बैठे। पशुओं ( मनुष्य सहित जीवों ) का अधिपति है पशुपति।
किसकी थी सिंधुघाटी सभ्यता ? आपको इसे जानने के लिए दूर नहीं जाना है ! आप मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रतिनिधि पुरुष के नाक नक़्शे को गौर से देखिये ...........
मूर्ति का मस्तक छोटा तथा पीछे की तरफ ढलुआ है गर्दन कुछ अधिक मोटी है तथा मुँह पर गोलाई बड़ी है , होंठ मोटे हैं नाक चौड़ी और कुछ ऊपर की ओर उभरी हुई है जबकि नृवैज्ञानियों ने बताया है कि आर्यों का मस्तक उभरा हुआ लम्बी गर्दन सुराहीनुमा तथा होंठ पतले एवं नाक नुकीली और तीखी है।
अब गाते रहिये कि देवी देवता सिंधुघाटी सभ्यता से पहले के है या वेद धारा पहले की है लेकिन प्रमाण चीख चीख कर आपको गलत साबित कर देंगे। नाक नक्शा का ये विरोधाभाष साबित करता है कि सिंधु घाटी सभ्यता आर्यों की नहीं थी।
एक झूठ छिपाने के लिए अनेक झूठ बोलने पड़ते हैं।
आपने एक बार झूठ बोल दिया कि हड़प्पा सभ्यता के बाद उत्तरी भारत में वैदिक युग आया , अब इसे साबित करने के लिए आप दूसरा झूठ बोल रहे हैं कि उत्तरी भारत में ताम्र पाषाण युग के बाद सीधे लौह युग आ गया आपने कांस्य युग की सभ्यता अर्थात बौद्ध सभ्यता को वैदिक युग की झूठी तोप से उड़ा दिया। पश्चिमोत्तर भारत में ताम्र पाषाण युग के बाद बतौर हड़प्पा सभ्यता कांस्य युग आया था। मगर पूर्वी भारत में इतिहासकारों ने कांस्य युग और लौह युग को एक साथ कुदा दिया है।
बौद्ध सभ्यता को सिंधुघाटी सभ्यता के समकक्ष लाये बगैर आपका इतिहास कभी सीधा नहीं हो सकता। बौद्ध सभ्यता सिंधुघाटी के समकालीन थी इसका प्रमाण है मगर बौद्ध सभ्यता छठवीं शताब्दी ई ० पू ० की थी इसका कोई प्रमाण नहीं है।
मैं गौतम बुद्ध के गांव के चोरी किये जाने की शिकायत करता हूँ। जाति चोरी , विचार चोरी , नाम चोरी आदि तो जानते थे घर से सामान चोरी भी जानते थे। बुद्ध का तो गांव ही चोरी कर लिया गया। गांव कहीं और बरसों से खुदाई कहीं और होती रही।
कपिलवस्तु मिला सिद्धार्थ नगर के गनवरिया में , गनवरिया अर्थात गणराज्य। अभी तक पुरातत्ववेत्ता डुप्लीकेट कपिलवस्तु को खोद रहे थे और उसी डुप्लीकेट कपिलवस्तु के आधार पर गौतम बुद्ध का समय छठवीं शताब्दी ई ० पू ० बता रहे थे अब जबकि ओरिजिनल कपिलवस्तु मिल गया है तब इतिहासकारों को बुद्ध का समय नए सिरे से निर्धारित करना चाहिए क्यूंकि ओरिजिनल कपिलवस्तु की पुरातात्विक सामग्री अलग प्रकार की है।
पुरातत्ववेत्ताओं के नए रिसर्च में गौतम बुद्ध की जन्मस्थली कपिलवस्तु को 2000 ई ० पू ० का बताया है और राम का जन्मस्थल अयोध्या को अधिक से अधिक 500 ई ० पू ० का बताया है। पुराना कौन है गणित लगाने की भी जरुरत नहीं पड़ेगी आपको।
कौन कहता है कि शाक्यवंशी राजा सुद्धोधन और उनके पुत्र गौतम बुद्ध के राजमहल का अवशेष नहीं मिलता ? जाइये , सिद्धार्थ नगर के गनवरिया में वहीं मिलेगा गौतम बुद्ध का आलीशान राजमहल !
कौन कहता है कि मौर्यवंशी राजाओं के राजमहल का अवशेष नहीं मिलता। जाइये , पटना के कुम्हरार में , वही मिलेगा चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के 80 स्तम्भों वाले विशाल राजमहल के अस्तित्व का संकेत !
अशोक - कनिष्क कालीन भारत का सांस्कृतिक इतिहास एक प्रकार से एशिया का सांस्कृतिक इतिहास है और तत्कालीन एशिया का सांस्कृतिक इतिहास सिर्फ एक व्यक्ति का सांस्कृतिक चिंतन है और वह व्यक्ति हैं गौतम बुद्ध।
बौद्ध धर्म वास्तव में सभ्यता नहीं है सही शब्दों में कहा जाये तो वह खान पान , रहन सहन और जीवन जीने की एक समूची प्रणाली है।
बौद्ध साहित्य में छिपा हुआ आस्तीन का सांप है " ललित विस्तर "। ललित विस्तर में लिखा है कि बुद्ध सिर्फ ब्राह्मण या क्षत्रिय के घर में ही जन्म ले सकता है ! चाण्डाल , शूद्र या निम्न जाति में वह जन्म नहीं ले सकता है। आप ललित विस्तर लिखने वाले या वेद में बुद्ध का विरोध लिखने वालों से घृणा मत करिये बस उनके मन में बुद्ध के प्रति कितनी घृणा रही होगी और क्यों रही होगी इस पर जरा विचार करिये।
गौतम बुद्ध ने जो भिक्षु-संघ बनाया था वह भीख मांगने वाले भिखमंगों का संघ नहीं था। बौद्ध भिक्षु का अर्थ ब्राह्मणवादी नजरिये से भिखमंगा है वरना इसका मूल अर्थ ध्यान करना है या शिक्षा प्रदान करना होता है , इस बारे में आप बी ० ए ० आप्टे की डिक्शनरी खोलकर क्यों नहीं देखते ?
पाली शब्द में सहवास का सिर्फ एक शब्द होता है - एक ही कमरे में दो बौद्ध भिक्षुओं का साथ में मिलकर रहना मगर हिंदी शब्दकोष में इसका एक ही अर्थ है सम्भोग। पाली शब्दकोष में समागम का अर्थ होता है "बौद्ध सभा " मगर हिंदी शब्दकोष में इसका अर्थ होता है मैथुन।
बुद्ध के अनुयायिओं को बुद्धू समझने वाले यदि भिक्खु का अर्थ भिखमंगा समझे तो इसमें आश्चर्य क्या ? बौद्ध भिक्षुओं का मतलब भिखमंगा कतई नहीं है ये गलत व्याख्या है। पूरा जापान बौद्ध भिक्षुओं से भरा पड़ा है , जापान भीख मांग रहा है क्या ? जापान तो आपको दे रहा है। अरुणाचल प्रदेश के मोंपा बौद्ध है , वो भीख मांग रहे है क्या ? आप नालंदा , राजगीर , बोधगया , सारनाथ गए होंगे , आपने देखा है किसी को बौद्ध भिक्षु को भीख मांगते हुए ? नहीं। भारत के हिमालय के पाद-प्रदेश में बसे खामती , तामंग या मोंपा भी बौद्ध भिक्षु ही हैं। आपने देखा है इन्हे भीख मांगते हुए नहीं ये सभी श्रमशील और खेतिहर जातियां हैं। बौद्ध भिक्षुओं को क्यों आखिर श्रमण कहा जाता है ? श्रमण का क्या अर्थ होता है , भिखमंगा होता है क्या ? जी नहीं ! श्रमण का अर्थ श्रम करने वाला होता है। आप श्रमण को भिखमंगा किस आधार पर कह रहे हैं। आपको पता होगा की इसी तर्ज पर उर्दू में भी एक शब्द है फ़कीर ! ये मितव्ययी और संत लोग हैं , इन्हे आप भिखमंगा नहीं कह सकते हैं।
कई इतिहासकारों ने ये संकेत दिया है कि गौतम बुद्ध मूर्ति पूजा के विरोधी थे। भारत में मूर्तियां या तो सिंधुघाटी सभ्यता में थी या फिर मौर्य काल में आखिर बुद्ध किस काल में मूर्ति पूजा का विरोध कर रहे थे जबकि वैदिक युग में मूर्तियां थी ही नहीं और मौर्य काल में बुद्ध थे नहीं ? हाँ वही पीपल में भूत बसते हैं ये वैदिक ग्रन्थ जरूर आपको बताते हैं। पीपल में भूत बसते हैं ये किस सभ्यता का विरोध है ? बौद्ध सभ्यता का ही तो है। मृतकों की आत्मा पीपल में बसती है , कौन टंगवाता है पीपल में घंट ? ये किस सभ्यता है ? वेदों का इंद्र पीपरु की हत्या करते हैं। पीपरु कौन ? पीपल पूजक ही तो थे। बुद्ध को पीपल के नीचे क्यों ज्ञान मिला ? बुद्ध के गावं का नाम आज पिपरहवा क्यों है ?
हिंदी क्षेत्र के पीपरा , पीपरी , पिपरिया जैसे गावं किस सभ्यता का प्रतीक हैं ? पीपल की उपाधि आज भी भारत के कौन से लोग धारण करते हैं? वही शूद्र अतिशूद्र। सिंधुघाटी सभ्यता का सबसे पवित्र बृक्ष कौन सा है ? वो पीपल ही तो है मोहनजोदड़ो हड़प्पा नगरों की मुहरे , मिटटी के बर्तनों पर किसके चित्र सर्वाधिक हैं ? वही पीपल की शाखाओं एवं पत्तों के। सिंधुघाटी के देवता सर पर क्या लगाए हैं ? पीपल ही तो है। मिथक इतिहास नहीं है मगर संकेत तो देता ही है।
नीचे की तस्वीर गया के पास की ढ़ोगेस्वरी गुफा की है। यही पर तपस्या करने के तुरंत पश्चात् बुद्ध को सुजाता ने खीर खिलाई थी। आखिर इसका नाम ढ़ोंगेश्वरी गुफा क्यों है ?
ढोंगी कौन था - बुद्ध , सुजाता या वह तीसरा जिसने इस गुफा का नाम रखा ? वह तीसरा कौन है ? भारत का इतिहास मौन है।
इसी तरह महाराष्ट्र में नासिक के पास बौद्ध गुफाएं हैं , इसे पांडव गुफाएं कहा जाता है। विराट नगर में सम्राट अशोक के अभिलेख और बौद्ध स्तूफ़ मिले हैं , इसे पांडवों का अज्ञातवाश बताया जाता है। गया के पास बराबर की पहाड़ियों में मौर्य राजाओं द्वारा बनाई बौद्ध गुफाएं हैं , इसे सुदामा गुहा और गोपी गुहा कहा जाता है। शोध का विषय है कि बौद्ध - मौर्यों की सामग्री महाभारत के पात्रों से क्यों जुडी हुई हैं ? भारत का इतिहास मौन है।
जिस मगध में नंद वंश , मौर्य वंश जैसे बड़े बड़े साम्राज्य खड़े हुए है, जिस मगध में बुद्ध ,मक्खली, गोशाल जैसे बड़े बड़े दार्शनिकों की शिक्षाएं गुंजायमान हुई और जिस मगध में राजगीर , पटना जैसे बड़े बड़े नगर स्थापित हुए उसी मगध में अथर्ववेद ने रोग फ़ैलाने का श्राप दिया है , उसी मगध में निवास करने पर देवलस्मृति ने गंगा - स्नान का प्राबधान किया है और उसी मगध के लोगों को महाभारत ने महापातकियों में गिनती की है।
आखिर क्यों ? वे कौन थे जिनके लिए मगध वर्जित इलाका था और जहाँ वे जीना तो क्या मरना भी नहीं चाहते थे। बौद्ध साहित्य और जैन साहित्य में तो मगध उनके निवासियों और उनकी राजधानी गिरिब्रज के बारे में बड़े बड़े वृतांत मिलते हैं और जैन आचार्य हेमचन्द्र ने तो मगध को पृत्वी का भूषण लिखा है।
आकाश पाताल का यह अंतर बगैर किसी कारण का नहीं हो सकता है।
बुद्ध की मृत्यु 483 ई ० पू ० में कैसे हुई ?
इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है। इतिहासकार बुद्ध के काल निर्धारण में अशोक और खारवेल से पीछे की ओर लौटते हैं हमें सिंधुघाटी की सभ्यता से आगे की ओर बढ़कर बुद्ध का काल निर्धारण करना चाहिए।
मुझे उस डॉक्टर (बैद्य ) की रिपोर्ट पर शक है जिसने लिखा है कि बुद्ध की मृत्यु जहर से नहीं वल्कि बुढ़ापे से हुई है। जब बुद्ध की हत्या किये जाने की कई साजिशें हुई हैं इसके प्रमाण भी हैं तब एक झटके में उनकी हत्या किये जाने की बात को कैसे ख़ारिज कर दे रहे हैं ? यदि उनकी मृत्यु स्वाभाविक थी तब बैद्य को ऐसी रिपोर्ट देने की क्या जरुरत थी की उनकी मृत्यु जहर से नहीं वल्कि बुढ़ापे से हुई है? फिर यदि कोई साजिश नहीं थी तो बुद्ध ने ऐसा क्यों कहा कि इसमें चुंद का कोई दोष नहीं है ? फिर भोजन संदिग्ध नहीं था तो वे क्यों शेष को जमींदोज कर दिए ? बुद्ध की मृत्यु शत-प्रतिशत संदिग्ध है।
शंकराचार्य के मठ भारत के चार कोनों में स्थापित हुए हैं भारत से बाहर कहीं नहीं , जबकि बुद्ध मठ चीन ही नहीं वल्कि तुर्की तक में स्थापित हुए हैं। असली जगतगुरु कौन है ? बुद्ध अथवा शंकराचार्य ? सिकंदर को विश्व विजेता क्यों कहा जाता है ? इसलिए कि उस समय विश्व की अवधारणा एशिया में सिकुड़ी हुई थी। अमेरिका आदि विश्व पटल से बाहर थे , फिर बुद्ध तो सिकंदर से भी पहले हुए हैं यदि एशिया में सैनिक विजय करने वाला सिकंदर विश्व विजेता है तो एशिया में धम्म विजय करने वाले बुद्ध विश्व गुरु कैसे नहीं हैं। कहते हैं प्राचीन में भारत भारत विश्व गुरु था। विश्व गुरु कौन था ? किसने विश्व को शिक्षाएं दीं ? किस गुरु की प्रतिमाएं विश्व भर में स्थापित हुई ? किसकी शिक्षाएं विश्व भर में अनुदित हुई ? किसे विश्व भर में शिक्षा देने के लिए बुलाया गया ? जाहिर है की वो बौद्ध थे।
गुणबर्मन, गुणभद्र , प्रज्ञारूचि , उपशून्य , ज्ञानभद्र , बुद्धभद्र, कमलशील , ज्ञानप्रभ , चित्रगुप्त जैसे हजारों बौद्ध विद्वान् यूनान तुर्की और मध्य एशिया से लेकर समूचे पूर्वी एशिया के देशों में शिक्षा देने के लिए बुलाये गए जिसमे एक भी हिन्दू विचारक शामिल नही है।
अतः भ्रम में मत रहिये विश्व गुरु सिर्फ और सिर्फ एक ही हैं और वो हैं बुद्ध।
अब थोड़ा सा विराम लेते हैं , आगे हम जानेंगे कि वैदिक साहित्यों में बौद्ध को किस स्तर पर दर्शाया गया है ?........
Source Books -
- 'इतिहास का मुआयना' ( डॉ ० राजेंद्र प्रसाद सिंह )
- 'बौद्ध धर्म : मोहनजोदड़ो हड़प्पा नगरों का धर्म' ( स्वपन कुमार विस्वास )
- ' प्राचीन भारत का इतिहास और संस्कृति ' ( के ० सी ० श्रीवास्तव )
- Harappa.com






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