मौर्ययुगीन भारत में वैदिक मिलावट
जो जीता वही सिकंदर है !
जो सिकंदर को जिताया वह सिल्यूकस है!!
और जो सिल्यूकस को भी जीता वह मौर्य है !!!
( डा ० राजेंद्र प्रसाद सिंह की इस बात से उन्ही के लेखों पर आधारित मौर्य काल को देखते हैं )
सिंधुघाटी की सभ्यता से लेकर नंद , मौर्य युगीन भारत तक जब सभी शासक गैर द्विज थे तब यह बात व्यर्थ है की भारत कभी द्विजों का था।
( यहां अगर नंद वंश की बात करें तो वे भी आदिवासी समुदाय से ही थे , ऐतिहासिक साक्ष्यों और स्रोतों के अनुसार नंद वंश के पहले शासक थे "महापद्मनंद" नापित (नाई ) समुदाय से आते थे । शायद इसलिए इतिहास में महापद्मनंद की जितनी भी भर्त्सना संभव थी, उतनी की गयी है। उन्हे गणिका (वेश्या) पुत्र से लेकर नीच कुलोत्पन्न, अनभिजात, नापितकुमार आदि कह कर अवहेलना की गई है। फ़िलहाल नंद वंश का शासनकाल लगभग बाईस वर्षों तक ही रहा है इसीलिए हम यहां मौर्य वंश की बात करेंगे जहां से भारत का विस्तार शुरू हुआ )
सिंधुघाटी सभ्यता और बौद्ध सभ्यता के बारे में हमने पिछले ब्लॉग में पढ़ा हुआ है अब आगे बढ़ते हैं यानि सिंधुघाटी की सभ्यता से आगे जो की मौर्य काल है।
इतिहासकारों के अनुसार आप सभी को मौर्यकाल की काफी कुछ जानकारी है परन्तु वास्तविक इतिहास मौर्य काल के बारे में क्या संकेत और प्रमाण देता है देखते हैं।
सतयुग की अवधारणा क्या है? यही कि तब लोग सत्य बोलते थे। झूठ नही बोलते थे। चोरी- डकैती नही थी। घर में ताले नही लगते थे। लोग ईमानदार थे। आपस में भाई - चारे का नाता था। परस्पर झगड़ा - झंझट कम था। शान्ति थी। यदि प्राचीन भारत में ऐसी कोई कमोबेश झलक मिलती है तो वह मौर्य काल में मिलती है। मौर्य काल के बारे में मेगास्थनीज ने लिखा है कि भारत के लोग कभी झूठ नही बोलते, मकानों में ताले नहीं लगाते और न्यायालय में बहुत कम जाते हैं। यदि प्राचीन भारत में सतयुग की कमोबेश परिकल्पना की जा सकती है तो वह मौर्य काल ही होगा।
इतिहासकारों ऐसा बताना है कि मौर्य की उत्पत्ति मुरा नाम की दासी से हुई थी झूठ है ये एक दम कोरा झूठ " मौर्य " की उत्पत्ति किसी मुरा नाम की दासी से नहीं हुई थी। आइये जानते हैं कैसे !
"मोरिय" का संस्कृत रूप है "मौर्य" !
पालि , प्राकृत और संस्कृत किसी भी भाषा के व्याकरण के अनुसार मुरा से मौर्य शब्द नहीं बनेगा। मुरा नाम की दासी की कहानी बाद में बनाई गई है।
मोरिय वास्तविक है और मौर्य कृत्रिम है वरना गया में आज भी फल्गु तट पर मोरिया घाट तथा कैमूर में बसहा गाँव के पास स्थित अशोक शिलालेख की पहाड़ी मठ मोरिया नाम से नहीं जानी जाती।
दरअसल कहानी कुछ यूँ है -
चन्द्रगुप्त मौर्य मोरिय नाम के कबीले से ताल्लुक रखते थे। मोरिय नाम के लोगो की कहानी आपको हमारे पूर्व ब्लॉग में सिंधुघाटी सभ्यता और बौद्ध सभ्यता के इतिहास " बुद्ध और भारत " में मिल जाएगी। मोरिय सिंधुघाटी और बौद्ध सभ्यता में आदिवासी समुदाय या फिर कहें मूलनिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। चन्द्रगुप्त मौर्य भी उसी मोरिय समुदाय से थे जो शाक्यों के रिश्तेदार भी थे। बुद्ध के वंश बृक्ष में आपको ये जानकारी स्पष्ट हो जाएगी। चन्द्रगुप्त की माँ उसी मोरिय कबीले के सरदार की बेटी थीं वे दासी नहीं थी इस भ्रम को दूर कीजिये।
मोरिय गण का टोटेम था मोर ( पक्षी )। मोर न तो आर्यों का है, न द्रविड़ों का। मोर आस्ट्रिकों का है। मोर की जड़ आर्य द्रविड़ भाषाओं में नहीं मिलेगी। इसकी जड़ आस्ट्रिकों की भाषाओँ में मिलेगी । संताली, मुंडारी, हो, मोन, शबर, मलय आदि आस्ट्रिक भाषाएँ हैं । ये भाषाएँ हजार - हजार हजार मील की दूरी पर हैं। अचूक एकता है इनमें , मगर आसपास की सटी भाषाओं से एकदम बेखबर! देखिये एकता का सूत्र इन्हे कैसे बाँधता है? मोर को संताली में माराक, मुंडारी में मराअः, हो म मरः, मोन में म्राक , शबर में मर, मलय में मेर आदि कहा जाता है। मोरिय गण का नस्ल - सिद्धान्त यहीं से प्रतिपादित होगा।
इतिहासकारों को यह जानना चाहिए की लोकमानस की वाचिक परंपरा में ऐसे तमाम तथ्य जिन्दा रह जाते हैं जो तोड़ मरोड़ कर लिए गए इतिहास में नहीं होते हैं।
नाम में भी कुछ रखा है ?
हमें सबसे प्राचीन पुरातात्विक रिकॉर्ड में कनकमुनि बुद्ध , प्रसेनजित और अशोक के जो नाम मिलते हैं वे क्रमशः कोणागमन बुद्ध , पसेन और असोक मिलते हैं । कोणागमन बुद्ध पसेन और असोक जैसी उच्चारण - रीति प्राकृत भाषा की है। ये सभी नाम इन व्यक्तियों के समय के हिसाब से निकटतम दूरी के हैं। कनकमुनि बुद्ध, प्रसेनिजत और अशोक जैसी उचारण - रीति संस्कृत की है । प्राचीन पुरातात्विक रिकॉर्ड में इस उच्चारण - रीति के नाम नही मिलते हैं। जाहिर है की कोणागमन बुद्ध , पसेन और असोक जैसे प्राकृत भाषा के नाम को बाद में संस्कृत भाषा के उच्चारण - रीति में तब्दील किया गया है। इससे साबित होता है कि संस्कृत का विकास प्राकृत से हुआ है। प्रथम अभिलेख भरहुत से है, दूसरा पिपरहवा से, तीसरा पुनः भरहुत से और चौथा मास्की से। आप लाल घेरे में सभी चार नाम को पढ़ सकते हैं ।
अशोक का वास्तविक नाम असोक है।
पहली तस्वीर मास्की शिलालेख की है । इसमें सम्राट अशोक ने अपना नाम लिखवाया है । अशोक का वास्तविक नाम " असोक " था। लाल घेरे म असोक लिखा है। तीनों लेटर बहुत स्पष्ट है आप भी पढ़ लीजिये। दूसरी विष्णु पुराण का एक पन्ना है। आप देख सकते हैं कि संस्कृत साहित्य में असोक के नाम की जगह " अशोक " लिखा है। आप भी पढ़ लीजिये।
निष्कर्ष यह है की अशोक का वास्तविक नाम " असोक " था। संस्कृत में " असोक " शब्द का संस्कार कर " अशोक " किया गया है। मतलब कि असोक मूल शब्द है और अशोक कृत्रिम शब्द है। असोक से अशोक बना है। कोई कन्फ्यूजन नहीं है।
आइये अब बात कर लेते हैं जन्मदिवस की !
चैत्र शुक्ल अष्टमी को मनाई जाने वाली सम्राट अशोक की अशोकाष्टमी उन्ही तथ्यों में से एक है। आपके काल्पनिक कथाओं में रामनवमी को राम जन्मे थे और जानकी नवमी को सीता जनमी थीं ये सब आपको ज्ञात है इसलिए इन अवसरों पर अवकाश भी हैं। मगर वास्तविकता में अशोकाष्टमी को सम्राट अशोक जन्मे थे यदि यह आपको ज्ञात नहीं तो ये आपकी कमजोरी है।
भारत का लोकमानस तो हज़ारों सालों से अशोकाष्टमी मनाता रहा है। अशोकाष्टमी का जिक्र तो दर्जन भर पुस्तकों में दर्ज है। सबूत क्या चाहिए आपको ? अशोकाष्टमी के दिन कौन पैदा हुआ था ? सम्राट अशोक ही न पैदा हुए थे कि कोई और ? पुराणों में तो लिखा है की अशोकाष्टमी के दिन अशोक बृक्ष की पूजा होती है तब इस दिन अशोक बृक्ष जनमा था। ऐसा नहीं।
अब ये मत कहियेगा की कई अशोक हुए ! भारत का इतिहास सिर्फ एक ही अशोक से गौरवान्वित है और वह हैं महान सम्राट अशोक मौर्य। अशोकाष्टमी निश्चित तौर पर सम्राट अशोक की जन्मतिथि है। इस अवसर पर अवकाश घोसित किये जाने के लिए बिहार सरकार को बधाई।
अभी तक जो इतिहास ज्ञात हो सका है , भारत में जन्मदिन मनाये जाने की परंपरा शासकों ने प्रारम्भ की थी। भगवतशरण उपाध्याय स्ट्रेबो (अमेसिया , 64 ई ० पू ० - 19 ई ० ) को उद्दत करते हुए लिखते हैं की चन्द्रगुप्त मौर्य अपना जन्मदिन प्रतिवर्ष बड़े पर्व के रूप में धूमधाम से मनाया करते थे। (बृहतर भारत पृ ० 35 - 36 )
सम्राट अशोक भी ऐसे ही अपना वार्षिक जन्मोत्सव मनाया करते थे तथा इतिहासकारों ने संकेत किया है की ऐसे ही वार्षिकोत्सव के दिन साल में एक बार कैदियों को मुक्त करने की प्रथा प्रारंभ की। ( प्राचीन भारत का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास , पृ ० -321 )
सम्राट अशोक को अष्टमी के दिन से विशेष लगाव था , ऐसे संकेत मिलते हैं। उन्होंने प्रत्येक पक्ष की अष्टमी के दिन बैल , बकरा , भेंड़ , सूअर और इसी तरह के दूसरे जीवों को नहीं दागने का आदेश जारी किया था। (पाटलिपुत्र की कथा - पृ ० 152 )
पाटलिपुत्र के जिस वार्षिकोत्सव का जिक्र बड़े गर्व के साथ चीनी यात्री फाहियान (399 - 411 ई ० पू ० ) ने किया है वह चैत्र शुक्ल अष्टमी के दिन मनाया जाता था। फाहियान ने लिखा है कि बीस बड़े और सुसज्जित रथों वाले विशाल जुलूस प्रत्येक साल निकाले जाते हैं और दूसरे महीने की आठवीं तिथि को इन्हे शहर में घुमाया जाता है। ऐसे जुलूस शहरों में भी निकाले जाते हैं।
कई इतिहासकारों ने फाहियान द्वारा उद्दत वार्षिकोत्सव की तिथि को समझने में भूल की है या फिर जानकर भी सही नहीं लिखा ? वे उस दिन को आज के हिंदी कैलेंडर की माह - गणना - प्रणाली के मद्देनजर वैशाख मान लिए हैं। कारण की आज की तारीख में वैशाख ही हिंदी कैलेंडर का दूसरा महीना है। मगर फाहियान आज से कोई 1600 साल पहले गुप्तकाल में भारत आया था और उस समय में साल का प्रथम महीना फाल्गुन था। आप कैलेंडर सुधार समिति (1955 ई ० ) की रिपोर्ट जांच लें जिसमे लिखा है की जो उत्सव 1400 वर्ष पहले जिन ऋतुओं में मनाये जाते थे वे 23 दिन पीछे हट चुके हैं। वर्तमान में वसंत संपात चैत्र में होता है इसलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपाद को वर्ष का प्रथम दिन मनाया जाता है। वसंत संपात प्रतिवर्ष 20 मिनट 24:58 सेकेण्ड पहले हो जाता है। इसीलिए फाहियान के समय संवत्सर का प्रथम माह फाल्गुन था और साल का दूसरा महीना चैत्र था। इसीलिए फाहियान ने जिस वार्षिकोत्सव का अपने यात्रा विवरण में जिक्र किया है वह चैत्र शुक्ल अष्टमी को मनाया जाने वाला अशोकाष्टमी है।
अशोकाष्टमी का विस्तृत वर्णन हमें कृत्यरत्नावली , कूर्मपुराण तथा व्रत परिचय में मिलता है। (पुराणकोश पृ ० 36 )
मगर पौराणिक सन्दर्भों की अशोकाष्टमी में अशोक बृक्ष का महत्व स्थापित है। अब आप अशोक बृक्ष और सम्राट अशोक मौर्य के बीच सम्बन्ध की जांच के लिए बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान का अध्ययन करें जिसमे लिखा है कि नामसाम्य के कारण सम्राट अशोक को अशोक बृक्ष बहुत प्रिय था या हजारीप्रसाद द्विवेदी की उस चंवरधारणी यक्षिणी को याद करें जो मथुरा संग्रहालय में अशोक बृक्ष का पौधा लिए खड़ी है। ऐसे में साबित होता है कि चैत्र शुक्लाष्टमी को मनाया जाने वाला वार्षिकोत्सव अशोकाष्टमी मूलतः सम्राट अशोक का जन्मदिन है जिसमे पुराणकारों ने सावधानी पूर्वक सम्राट अशोक को विस्थापित करके सिर्फ अशोक बृक्ष को जोड़ लिया है।
बुद्ध , महावीर और अशोक के समय में तो मार्च , अप्रैल और मई आदि का जन्म भी नहीं हुआ था। आप जो यह समझ रहे हैं कि अशोक की जयंती 14 अप्रैल को है तो यह ग़लतफ़हमी है आपकी ! महज यह संयोग है कि 2016 में चैत्र शुक्लाष्टमी अर्थात अशोकाष्टमी 14 अप्रैल को पड़ी थी लेकिन अगले सालों में वो किसी और तारीख को पड़ेगी। अंग्रेजी काल गणना पर नहीं वल्कि चंद्र - काल गणना पर आधारित है - अशोकाष्टमी।
आपको तो मालूम है की पूरे भारत के बाहर भी अशोक के अभिलेख बड़े पैमाने पर पाए गए हैं। मगर पाटलिपुत्र में सम्राट अशोक का एक भी अभिलेख नहीं है , तब क्यों नहीं इतिहासकार कह देते हैं कि पाटलिपुत्र सम्राट अशोक की राजधानी नहीं थी। वास्तविक इतिहास मिटाये नहीं मिटता है यदि मिटा भी देंगे तो तो वह जनता की याददाश्त में जिन्दा रहता है।
स्ट्रेबो ने लिखा है कि चन्द्रगुप्त मौर्य अपने जन्मदिन पर दरबार में अपने केश धुलवाते थे , जो प्रतिवर्ष दोहराये जाने वाला अभिषेक था और बड़े पर्व के रूप में धूमधाम से मनाया जाता था।
अब तो आप जान ही चुके हैं कि जन्मदिन मानाने की परंपरा मौर्यों ने प्रारम्भ की। एक चित्र साँची स्तूफ़ के पूर्वी तोरण द्वार की सबसे निचली वंडेरी पर अंकित है। मूर्त चित्र अशोक के केवल आधी पौनी शताब्दी बाद की रचना है। सम्राट अशोक हांथी से उतरकर खड़े हैं उनके आगे एक बौना और दोनों तरफ चंवरधारणिया हैं , उनके बाएं तरफ चंवरधारणियों के पीछे रानी दीख पड़ती हैं।
यह दृश्य अशोकाष्टमी का है।
इतिहास की खोज में आपको भारत के बाहर भी झांकना होगा !
एक पुस्तक है " उत्तरबिहारट्टकथाएं " ! इस पुस्तक की भाषा पालि है और लिपि रोमन एवं वर्मी है। यह मांडले के एक प्रेस से 1944 में छपी थी।
यदि भरतसिंह उपाध्याय की बातों पर यकीन करें तो उत्तर विहार परम्परा का अट्टकथा साहित्य ईसा की चौथी सदी से पहले का है। जिन इतिहासकारों को नहीं पता है कि सम्राट अशोक की जन्मतिथि कब है उन्हें यह किताब पढ़नी चाहिए। यह किताब वर्ष क्रम से लिखे भारत के इतिहास को तिथि क्रम में बदल देने की ताक़त रखती है। इसमें लिखा है की सम्राट अशोक का जन्म चैत्र मास शुक्ल पक्ष अष्टमी को हुआ था।
चेन्तमासे सुक्क - अट्टीमी दिवसे उप्पजीजत्वा, पस्सेसो दुल्लभो लोको , पातुभावो अभिण्हसों।
असोको आसि तेसं तु पुयातेज़बलोरिधको।
ऐसे इतिहासकार जिन्हे नहीं पता कि मौर्य काल में तिथि अंकन की विधि मौजूद थी , उन्हें सम्राट अशोक का पांचवा स्तम्भलेख पढ़ना चाहिए। मौर्यकाल में वर्ष , ऋतुए , नक्षत्र , महीना , पखवाड़ा , पूर्णिमा आदि सभी कुछ से काल - गणना हुआ करती थी। पांचवे स्तम्भलेख में ऋतु , माह , पखवाड़ा , पुनर्वसु , पूर्णिमा आदि सब कुछ है।
शायद इतने से आप इतिहास में मिलावट को समझ पा रहे होंगे।
(तो अब मैं अशोक लिखूं या असोक ये आप लोगों पर निर्भर करता है की आप उसे वास्तविकता की आँखों से देखते हैं या फिर काल्पनिकता की आँखों से मगर वास्तविकता यही है कि वे असोक ही हैं , खैर अभी के लिए थोड़ा समय लेते हैं बाकी की वास्तविकता के लिए थोड़ा समय दीजिये। )
Source Books -
- 'इतिहास का मुआयना' ( डॉ ० राजेंद्र प्रसाद सिंह )
- 'बौद्ध धर्म : मोहनजोदड़ो हड़प्पा नगरों का धर्म' ( स्वपन कुमार विस्वास )
- 'फाहियान की भारत यात्रा' ( फाहियान )




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