बुद्ध और भारत V
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अभी तक के इतिहास में शायद आपको पता लग गया है कि क्या पुराना है और क्या बाद का है और अगर आपके अंदर ये सवाल अभी भी है कि जब ब्राह्मण तीर्थस्थल और वेद पुराण जब इतने बाद के हैं तो इसको प्राचीन साबित करने वाले ऐसा क्यों कर रहे है और कौन लोग कर रहे हैं तो आप अब सिंधुघाटी सभ्यता या कहे की बौद्ध सभ्यता के करीब से सोंचना शुरू कर चुके हैं !
खैर आगे देखते हैं और क्या क्या मिलावट किया है वैदिक संस्कृति ने इतिहास में................
इतिहासकारों ने मौर्य वंश के पतन के लिए तो बौद्ध धर्म को जिम्मेबार बताया है मगर गुप्त वंश के पतन के लिए ब्राह्मण धर्म को जिम्मेबार नहीं बताया है ! उल्टे यह लिखा है कि बाद में गुप्त राजाओं का बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव हो गया था इसलिए गुप्त वंश का पतन हो गया।
भाई ! राष्ट्रीय एकता की जगह जाति - पाति फैलाइएगा , अश्वमेघ यज्ञ कराईएगा , सती के नाम पर स्त्रियों को जलाइएगा और इमारत के नाम पर सिर्फ मन्दिर बनाइएगा तो साम्राज्य का पतन तो होगा ही।
इसके लिए ब्राह्मण-धर्म ही तो जिम्मेबार है? नहीं है क्या ?
सिंधुघाटी सभ्यता से लेकर मौर्य काल तक नगर , भवन , सड़कें , गलियां मिलती हैं। क्या कारण है कि गुप्त काल का ऐसा कुछ नहीं मिलता सिवाय मंदिरों के ?
आइये अब कुछ शब्दों को देख लेते हैं ,
एक शब्द जो हर ब्राह्मणवादी किताब में मिल जायेगा वो है - राक्षस
सिंधुघाटी की सभ्यता में राक्षस थे नहीं और गोतम बुद्ध ने किसी राक्षस का वध किया नहीं। बुद्ध के बाद नन्द वंश , मौर्य वंश , गुप्त वंश और राजवंश थे , फिर कहाँ से आये इतने सारे राक्षस ? कौन थे राक्षस ? कब के थे राक्षस ?
राक्षस के अर्थ - सम्बन्धी जो भी प्राचीन साहित्य के सबूत हैं , वे गवाही देते हैं कि राक्षस का मूल अर्थ रक्षा करना ही है। राक्षस को पालि और प्राकृत में " रख्खस " कहा जाता है। " रख्खस " का अर्थ है - "रख्ख" अर्थात "रखवाली" "रक्षण " या पालन करने वाला। वेदों का "रक्षण " भी पालि और प्राकृत से भिन्न नहीं है। वेदों में भी रक्षस के दो अर्थ प्रमुख हैं - 1 . रक्षा करने वाला , 2 . अन्न का छिलका। छिलका अन्न का रक्षक है और रक्षस देश या समाज के रक्षक थे। भाषा वैज्ञानिकों ने बताया है की अंग्रेजी का HUSKS (छिलका , भूसा ) इसी रक्षस का प्रतिरूप है।
ऐसा जान पड़ता है कि आक्रमणकारियों ने देश के रक्षक को ही राक्षस बताया है जैसे अंग्रेजों ने स्वतंत्रता सेनानियों को विद्रोही बताया है।
आइये अब एक दूसरा शब्द देख लेते हैं - भूत
मौर्य काल में मौर्यों का शासन था , गुप्त काल में गुप्तों का शासन था और भूतकाल में भूतों का शासन था। भूत अर्थात "मूलनिवासी "। भारतीय इतिहास में मौर्य काल है गुप्त काल है वैदिक काल है ! ये भूतकाल क्या है ? बीते हुए काल को , बीते हुए इतिहास को आर्यों ने भूतकाल कहा है। इतिहास में वह काल भूतकाल है जब भारत में भूतों का शासन था , या भूतों का भारत था।
आइये जानने की कोशिश करते हैं कि ये भूत कौन थे ?
ये वही भूत थे जो भारत में भूत भाषा या पिशाच भाषा बोलते थे। डा ० भोलानाथ तिवारी ने लिखा है कि भूत भाषा या पिशाच भाषा भारत के चारो और निम्न स्तर के लोगों में प्रचलित थी। आज भी कश्मीरी भाषा और साहित्य का 500 ई ० पू ० तक का काल खण्ड "नाग पिशाच काल" ही कहा जाता है।
तुलसीदास ने ऐसे ही नहीं लिखा हुआ है - भूत पिशाच निकट नहीं आवें ' महावीर जब नाम सुनावे।
आर्यों द्वारा भूतकाल (Past Tense) की अवधारणा साबित करती है कि भारत भूतों का था , पिशाचों का था।
गाते रहिये हनुमान चालीसा !
एक और मजेदार वाक्य है.........
"पृथ्वी नाग के फन पर टिकी है"। इसका क्या मतलब है ?
वैसे तो ये बात आज के आधुनिक युग में अधिकतर लोग समझते होंगे , लेकिन आखिर ये बात उस समय क्यों कही गई आइये समझते है -
इसका मतलब यह है कि कभी नागों का शासन पृथ्वी पर दूर दूर तक था जैसे अंग्रेजी शासन में सूर्य कभी नहीं डूबता था , मतलब की अंग्रेजों का शासन लगभग पूरी पृथ्वी पर था अगर एक जगह उनके शासन में सूर्य डूबता तो दूसरी जगह के शासन में सूर्य उगता था कहने का मतलब की सूर्य डूबता ही नहीं था। इसी प्रकार यह भी कहा गया है कि पृथ्वी नाग के फन पर टिकी हुई थी आप अवज्ञा में कह सकते हैं कि आधुनिक काल में अंग्रेजो और प्राचीन काल में नागों का शासन दूर दूर तक था।
नागौर , नागपुर , छोटा नागपुर , अनंत नाग जैसे स्थानवाची नाम ऐसे ही थोड़े न हैं।
महिषासुर की लड़ाई पूरब - दक्षिण भारत में हुई थी , आप पश्चिम - उत्तर भारत के मोहनजोदड़ो में कैसे ले गए भाई ? ऐतिहासिक फिल्म की पटकथा का कथासार सिर्फ वहीं अपनी काल्पनिकता का रंग भर सकता है जहां इतिहास चुप है। जब महिषासुर था तब दुर्गा भी होगी ? किसकी थी नरमुंडों की माला , विदेशियों की या विधर्मियों की ? मोहनजोदड़ो में मिली है नरमुंडों की माला ? नहीं ! वह खोपड़ी जिसमे कोई खून पीता था मिली है मोहनजोदड़ो में ? नहीं ! क्यों नहीं मिला ये सब या इनमे से कुछ भी ? कोई कह रहा है तो कहने दीजिये , भारतीय प्रायद्वीप के बाहर जब द्रविड़ कहीं मिलते ही नहीं हैं तब वे बाहर से आये कहाँ से ? है जवाब किसी ब्राह्मण के पास ?
एक और शब्द है - चितपावन लोग
ये कौन हैं चितपावन लोग ?
आर्यपुत्र दारयवहु (521 -485 ई ० पू ० ) पारस साम्राज्य का राजा था , उसके अधीन 21 प्रान्त थे। प्रांतों के शासन थे क्षत्रपावन ! चितपावन कहलाते थे। यही तो भारत में चितपावन हैं। ( सन्दर्भ : रामचन्द्र शुक्ल , प्राचीन पारस का इतिहास एवं जयचंद्र विद्यालंकर इतिहास प्रवेश , पृष्ठ 93 )
प्रख्यात अर्थशास्त्री वेबलेन ने 19 वीं सदी के आखिरी दौर में अपनी मशहूर किताब " द थियरी ऑफ़ लेज क्लास " के पहले ही पैराग्राफ में भारत को " ब्राह्मण भारत " लिखा है। जाहिर है की इसी " ब्राह्मण भारत " की जहालत और गरीबी को देखकर आधुनिककाल के विदेशियों ने इसे शंख बजाने वाले चमत्कारियों , सपेरों , नट और मदारियों का देश कहा है।
काश ! यदि वे बौद्ध भारत को देखे होते तो भारत को वे शंख बजाने वाले , चमत्कारियों , सपेरों , नटों और मदारियों का देश ना कहकर शांति के उद्घोषकारियों , शिक्षा , समृद्धि और विश्वविद्यालयों का देश कहते।
अजब विडम्बना है , भारत में जब बौद्ध संस्कृति की चलती थी तब आपने गोतम बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया और जब भारत में मुग़ल संस्कृति की चलती थी तब आपने अकबर को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया। और आज भी कई ऐसे पाखंड से ओतप्रोते नासमझ धर्मगुरु हैं और बन रहे हैं जो खुद को अपने पिछले जन्म में बुद्ध होना बताते हैं जबकि उन्हें बुद्ध और बौद्ध संस्कृति का क ख ग भी नहीं पता है , कमाल के प्रपंची और अज्ञानी लोग हैं ये।
विज्ञान की दृष्टि से देखें तो एक बात के लिए वाह निकलती है -
वाह ! विज्ञान की कितनी सुन्दर परिकल्पना है !
अरे ओ , पृथ्वी से 5000 प्रकाश वर्ष दूर किसी ग्रह पर रहने वाले लोगों ! बताओ न इन अज्ञानियों को ? कि कैसी है सिंधुघाटी सभ्यता ? क्या खा रहे हैं हड़प्पाई लोग ? कैसे चल फिर और बतिया रहे हैं मोहनजोदड़ो के लोग ? विश्वविद्यालयों में कैसे पढ़ाई कर रहे हैं बौद्ध भिक्षु ? तुम तो अभी और इसी वक़्त सिंधुघाटी सभ्यता को जिंदा देख रहे हो न ?
विचार कीजिये , यदि कोई गेंद किसी कुँए में पानी की सतह से टकराई हो तो उसकी आवाज हमें थोड़ी देर में सुनाई देती है। ठीक वैसे ही बहुत दूर की किसी वस्तु के बिंब - दृश्यों को आँखों तक पहुँचने में भी समय लगता है। परिकल्पना कीजिये , एक ऐसे ग्रह की जहां की दूरी पृथ्वी से 5000 प्रकाश वर्ष है या उससे अधिक है। ऐसे ग्रह पर पृथ्वी की किसी वस्तु के बिंब - दृश्यों को पहुंचने में 5000 साल तो लगेंगे।
यदि पृथ्वी से 5000 प्रकाश वर्ष दूर किसी ग्रह पर कोई सभ्यता है तो वहां के लोग अभी और इस वक़्त 5000 साल पुरानी सिंधुघाटी सभ्यता को साक्षात् देख रहे होंगे। मगर आज की २१ वीं सदी को उस ग्रह के लोग अभी 5000 साल बाद देख पाएंगे।
है ना कमाल की परिकल्पना , हो सके तो उनकी आँखों से तर्क और साक्ष्य के आधार पर आप अभी देखना शुरू करें क्या पता आपको भी सिंधुघाटी सभ्यता और बौद्ध सभ्यता के दर्शन हो जाएं।
( वैदिक साहित्य की मिलावट इतने ही में बस नहीं है ये सिर्फ शुरुआत है और इसीलिए हमने सिंधुघाटी सभ्यता और बौद्ध सभ्यता से शुरू किया अब आगे आपको बताएंगे कि मौर्य काल, गुप्त काल , मुगल काल और फिर आधुनिक काल में जो ब्राह्मणवाद ने मिलावट की है; और क्या खेल किया है इतिहास के साथ उस पर जाने की कोशिश करेंगे। बाकी यही कहेंगे की भारत के हर मूलनिवासी को यह जानने की लिए कोशिश करनी होगी की आखिर वो है क्या? उसकी पहचान क्या है? काल्पनिकता और झूठ में लिपटी हुई संस्कृति उसकी है या फिर वो संस्कृति जो उसे चीख चीख कर अपने होने का प्रत्यक्ष प्रमाण दे रही है ! )

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