बुद्ध और भारत

 चिनुआ अचेबे जो कि एक नाइजीरियाई  उपन्यासकार , कवि , प्राध्यापक एवं आलोचक रहे हैं जिन्हे आधुनिक अफ़्रीकी साहित्य का जनक भी कहा जाता है जिन्हे मैन बुकर  अंतराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त है इनके द्वारा कही  गई एक बात जो की भारत के इतिहास की कथाओं का बिलकुल सटीक विश्लेषण करती है --

" जब तक हिरन अपना इतिहास खुद नहीं लिखेंगे तब तक हिरणों के इतिहास में शिकारियों की शौर्यगाथाएं गायी जाती रहेंगी " 

वास्तविकता का इतिहास और इतिहासकारों के उपलब्ध इतिहास में फर्क होता है इसलिए भारत के इतिहास में वैदिक संस्कृति उभरी हुई है  बौद्ध संस्कृति पिचकी हुई और मूलनिवासियों का इतिहास बीच बीच में उखड़ा हुआ है जो शायद ही मूलनिवासियों को ज्ञात है। 

क्यूंकि हम यहाँ बुद्ध और भारत की बात कर रहे हैं तो उसी की बात करते हैं --



इतिहासकार  के ० सी ०  श्रीवास्तव ने ' प्राचीन भारत का इतिहास और संस्कृति ' में लिखा है की भरहुत लेखों तथा पालि साहित्य में शाक्यमुनि ( गौतम बुद्ध ) के अतिरिक्त पांच पूर्व बुद्धों का उल्लेख मिलता है -

१. विपस्सी ( विपश्यीन ), २. वेसभूणा ( विश्व भू ), ३. ककूसंध ( क्रकच्छन्द ) ४. कोनागमन ( कनकमुनि ) ५. कस्सप बुद्ध 

शाक्य मुनि (गौतम बुद्ध ) जिनकी स्मृति में सम्राट अशोक ने रुम्मिनदेई अभिलेख के अनुसार लुंबनी के भूमिकर में कटौती की थी। 

कोनागमन बुद्ध जिनकी स्मृति में सम्राट अशोक ने निगलीव अभिलेख के अनुसार निगालिसागर के स्तूफ़ को दुरुस्त करावाया था। 



कस्सप बुद्ध जिनके स्मृति स्थल को चीनी यात्री फाहियान ने श्रावस्ती के पश्चिम में देखा था। 

क्रकच्छन्द बुद्ध जिनके स्मृति स्थल को भी चीनी यात्री फाहियान ने श्रावस्ती के दक्षिण पश्चिम में देखा था। यदि फाहियान पर यकीन करे तो उसने श्रावस्ती के पश्चिम में कस्सप बुद्ध का स्मृति स्थल देखा था और श्रावस्ती के दक्षिण पश्चिम में  क्रकच्छन्द बुद्ध का स्मृति स्थल देखा था। 



यद्यपि गौतम बुद्ध से पहले कितने बुद्ध हुए और उनका कालक्रम क्या है यह इतिहासकारों के लिए चुनौती है फिर भी मेजर फ़ोर्ब्स ने जर्नल ऑफ़ एशियाटिक सोसाइटी जून 1836 अंक में क्रकच्छन्द बुद्ध का समय 1301 ई ० पू ० कनकमुनि का 2099 ई  ० पू ० तथा कस्सप बुद्ध का १०१४ ई ० पू ० बताया है। 

अब यदि कई बुद्ध होने की बात झूठ है तो फिर अशोक के अभिलेख सत्य कैसे हैं जिनमे कनकमुनि बुद्ध का पुरातात्विक प्रमाण है ?

यदि कई बुद्ध होने की बात झूठ है तो फिर फाहियान का बृतान्त सत्य कैसे है जिसमे क्रकच्छन्द बुद्ध और कस्सप बुद्ध के स्मारकों का आँखों देखा बयान है ?

यदि कई बुद्ध होने की बात झूठ है तो भरहुत के लेख सत्य कैसे हैं जिनमे अन्य बुद्ध होने के प्रमाण हैं ?

यदि अशोक के अभिलेख , फाहियान का यात्रा वृतांत और भरहुत के लेख सब झूठ है तो फिर आपका इतिहास सच कैसे है ?

जब मेजर फोर्ब्स ने जर्नल ऑफ़ एशियाटिक सोसइटी जून 1826  अंक में  क्रकच्छन्द बुद्ध का समय 1301 ई ० पू ०  और कनकमुनि का 2099 ई  ० पू ० तथा कस्सप बुद्ध का १०१४ ई ० पू ० बताया है तब मानना ही पड़ेगा कि सिंधू घाटी सभ्यता बौद्ध सभ्यता ही थी। 

अब बात करते हैं बौद्ध धर्म या सही शब्दों में कहा जाए तो बौद्ध  सभ्यता की -

 गौतम बुद्ध  बौद्ध धर्म के संस्थापक नहीं थे वे तो बौद्ध धर्म के प्रवर्तक थे , संस्थापक और प्रवर्तक में अंतर होता है गौतम बुद्ध ने धम्म चक्र का प्रवर्तन किया था, वे धम्म चक्र के संस्थापक नहीं थे। 

संस्थापक किसी धर्म की स्थापना करता है जबकि प्रवर्तक पहले से चले आ रहे किसी धर्म को परिमार्जित करते हुए नये सिरे से शुरू करता है।  बौद्ध धर्म गौतम बुद्ध से पहले भी था। 

आर्य सत्य (अरिय सच्च ) की स्थापना गौतम बुद्ध ने नहीं की थी उन्होंने इसिपतन में धम्म चक्क का प्रतिपादन किया था। 

अरिय सच्च का अर्थ भाष्यकारों ने गलती  से आर्य सत्य किया है अरि का अर्थ होता है चक्क (चक्र ), और अरिय का अर्थ होता है चक्क (चक्र ) से सम्बंधित अतः अरिय सच्च का वास्तविक अर्थ है धम्म चक्क से जुड़ा हुआ सच्च (सत्य ), आर्य से जुड़ा हुआ सत्य नहीं।  अरिय सच्च को आर्य-सत्य कहना वैसे ही गलत है जैसे मुअनजोदड़ो को मोहनजोदड़ो  और गोतम बुद्ध को गौतम बुद्ध कहना। इतिहासकार स्वपन कुमार विश्वास ने भी बताया है कि धम्म चक्क (धर्म चक्र ) की अवधारणा सिंधु घाटी में थी और वहीँ से आगे बढ़ी है।  गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक नहीं थे प्रवर्तक थे अतः प्रवर्तक की हैसियत से उन्होंने कुछ जोड़ा प्रवर्तित किया। 

सिंधु घाटी के धम्म चक्क में छह आरे थे एक आरे का फर्क नहीं पड़ेगा नीचे की तस्वीर में गिनकर देख लीजिये जबकि गौतम बुद्ध के चक्क में आठ आरे हैं ,  गौतम बुद्ध द्वारा धम्म चक्क में दो आरे जोड़ना प्रवर्तन है यही अरिय सच्च है, जिसे आप सभी लोग गलती से आर्य सत्य कह रहे हैं। 



अब जरा बात कर लेते हैं सिंधु घाटी की भाषा और नामों पर -

 जब गौतम बुद्ध थे तब ना संस्कृत थी और न ही संस्कृत संधि के नियम क़ानून थे इसलिए संस्कृत के नियम क़ानून से बने सिद्धार्थ और उनकी पत्नी का नाम यशोधरा डुप्लीकेट है पहले में संस्कृत की दीर्घ संधि है और दूसरे में विसर्ग संधि है। दरअसल सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि के चिन्ह दो प्रकार के हैं सिंधु घाटी की लिपि में कुछ चिन्ह तो चित्र जैसे हैं और कुछ अक्षर हैं , जो अक्षर हैं उनमे अनेक अशोक के स्तम्भ की लिपि से मिलते जुलते हैं।  सिंधु घाटी सभ्यता और बौद्ध सभ्यता लिपि के मामले में एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं , सिंधु घाटी की लिपि और धम्म लिपि अनेक मामलों में एक जैसी हैं। 

आपको आश्चर्य क्यों होता है ? जब हम कहते हैं कि गोतम का गौतम नाम डुप्लीकेट है जबकि आपको पता है कि एलेक्जेंडर का नाम सिकंदर भी डुप्लीकेट है।  जैसे फारस वालों ने  एलेक्जेंडर का यूनानी नाम बदलकर फ़ारसी में सिकंदर कर दिया वैसे ही संस्कृत वालों ने गोतम का प्राकृत नाम बदलकर संस्कृत में गौतम कर दिया। 

 आपको आश्चर्य क्यों होता है ? जब हम कहते हैं कि गोतम के साथ सिद्धार्थ उपनाम बाद में जुड़ा है जबकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि तैमूर के साथ लंग उपनाम भी बाद में जोड़ा गया है, भला कोई माँ बाप अपने बेटे का या कोई सम्राट अपनी उपाधि लंग ( लंगड़ा ) क्यों रखेगा ? नामों की तोड़ मरोड़ आज से थोड़े ना है , सिंधु घाटी की सभ्यता और बुद्ध से लेकर दीपा कर्मकार तक कई नाम तोड़े मरोड़े गए हैं। हड़प्पा नाम वेद से लिया गया है और मोहनजोदड़ो पुराण से।  गौतम (गोतम ) बुद्ध का तो सिद्धार्थ नाम था ही नहीं। 

सिंधु घाटी की सभ्यता आस्ट्रो द्रविड़ों की है , दरअसल बौद्ध सभ्यता का क्रमशः विकास हुआ है उसमे कई चीजे बाद में जुडी है और कई हटी हैं। जैसे बृक्ष विशेषकर पीपल पूजा किन की है ? आस्ट्रो द्रविड़ों की ही तो है फिर ये सब बौद्धों में भी है 'बोध बृक्ष' । संथालों का मारंग मारु कौन है ? बुद्ध की तरह ज्ञान और प्रज्ञा के देवता हैं। साहेबगंज के संथालों में धार्मिक क्रियाकलापों के दौरान सिंधु लिपि जैसी लिपि का प्रयोग होता है। हम बौद्ध धर्म को आज की तारिख में देख रहे हैं हम आदिवासी समाज को आज की तारिख में देख रहे हैं। हंटर ने लिखा भी है कि संथालों के बीच बौद्ध धर्म प्रचलित था, आज भी कई आदिवासी समुदाय बौद्ध ही तो हैं - मोंपा , शेरडुकपेन , मेंबास , खामती , सिंहपो , तामंग ये सभी बौद्ध धर्म में भीगे हुए समुदाय हैं।  निचले बंगाल में आदिवसीय बहुल इलाकों में शिव की की नाक चपटी होंठ मोटे हैं शिव आदिवासियों के हैं योग संस्कृति के हैं वही योग संस्कृति जो बौद्ध सभ्यता  में मौजूद है और वही सिंधु घाटी की सभ्यता में भी।  बौद्ध सभ्यता का आरंभिक विकास आदिवासियों ने ही किया।  बौद्ध सभ्यता का विकास हजारों सालों में हुआ कई पीढ़ियों ने कई समुदायों ने कई लोगों ने इसके विकास में योगदान किया है। 

आइये अब गौतम बुद्ध के वास्तविक नाम गोतम और उनके वंश बृक्ष पर विचार करते हैं -

डी डी कोसंबी ने बताया है कि गौतम बुद्ध का वास्तविक नाम गोतम बुद्ध तथा उनकी पत्नी का नाम कच्चाना था , वे यह भी बताते  हैं कि गोतम बुद्ध के जन्म नाम में डुप्लीकेट नाम सिद्धार्थ बाद में जोड़ा गया है और वे गोतम बुद्ध की पत्नी कच्चाना के नाम यशोधरा को इतना डुप्लीकेट मानते हैं की पुरे इतिहास-ग्रन्थ में इस नाम का उल्लेख तक नहीं करते। गोतम नाम पर विचार करने के लिए आपको संस्कृत की दुनिया को छोड़ना पड़ेगा एवं कोलों की दुनिया में लौटना होगा जिन कोलों की दुनिया में गोतम की माँ लुमिनीं जन्मी थी वह लुमिनीं जिनका डुप्लीकेट नाम इतिहासकारों ने महामाया बताया है। 

संथाली , मुंडारी और हो जैसी भाषाएँ कोलो की है।  आप इन भाषाओ का शब्दकोष देख लीजिए सीधे सीधे गोतम शब्द मिलेगा, घी के अर्थ में ! इन सभी भाषाओं में घी को गोतम ही कहा जाता है कहीं कहीं बंगला के प्रभाव में गोतोम भी। घी दूध दधी के आधार पर नामकरण करने की परंपरा पहले भी थी आज भी है।  संस्कृत में भी - घृतप्रस्थ , दधिवाहन , नवनीत कुमार और लोक में मख्खन सिंह , दूधनराम , राबड़ी देवी आदि आज भी देख सकते हैं। 

कच्चाना-गोतम पुत्र राहुल को  हुल जोहार !

यदि आप चाहें तो एक सूत्र अब याद कर सकते हैं वह यह कि जिन ग्रंथों में गोतम का नाम सिद्धार्थ , पत्नी का नाम यशोधरा और माता का नाम महामाया आया है वे बहुत बाद में लिखे गए ग्रन्थ  हैं ! ऐसे सभी ग्रन्थ तब लिखे गए हैं जब भारत की जनता बुद्ध का वास्तविक नाम "गोतम " उनकी पत्नी का वास्तविक नाम "कच्चाना " तथा उनकी माता का वास्तविक नाम "लुमिनीं " भूल चुकी थी।  साहित्य में डुप्लीकेट नामों की सेंधमारी तब होती है जब वास्तविक नाम कहीं गुम हो जाया करते हैं। 

भाषा विज्ञान बताता है की कोई भी भाषा 1000 सालों में अपने शब्दकोष का 19% शब्द गुम कर देती है।  तब यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बुद्ध से जुड़ी नामावाची शब्दावली को गुम होने में हज़ारों साल लगे होंगे !

आइये अब कुछ विचार गोतम बुद्ध के वंश पर कर लेते हैं -

गोतम बुद्ध का वंश बृक्ष आधुनिक भारत की अनेक जातियों का समुच्चय था ! 

गोतम  का जन्म किस कुल में हुआ था ? वही शाक्य वंश में ! शाक्य कौन ? वही शाक्य , सागबरिया , सागबेरिया आदि। 

गोतम का ससुराल कहाँ था ? वहीं कोलिय वंश में ! कोलिय कौन ? वही कोल , कोली , कोरी , कुरी , कुर्मी , कोइरी किरार , कोलीय आदि। 

गोतम की पत्नी कौन थीं ? वही गोपा ! गोपा कौन ? वही गोप , गोआर , ग्वाल , गड़ेरी आदि। 

गोतम की पत्नी का दूसरा नाम क्या था ? वही भद्रकच्छा ! कच्छा कौन ? वही काछी , कछवाहा , कछवी , काची , कचिया आदि। 

गोतम बुद्ध को खीर किसने खिलाई ? वही सुजाता ! सुजाता कौन ? वही सैनी , सेनी , सेना आदि। 

गोतम बुद्ध के शव पर वंश को लेकर किसने अधिकार जताया ? वही मल्ल , मोरिय आदि ने ! मल्ल मोरिय कौन ? वही मल्लाह , मोरी , मोरे , मरार , मुराव , मुराई , मौर्य आदि। 

इतिहास में जैसे जैसे पीछे की ओर लौटिएगा तो जातियों की संख्या कम होती जाएगी। 

एक और नाम है रुम्मिन देई जो अशोक के रुम्मिनदेई स्तंभ लेख से मिलता है।   रुम्मिनदेई कौन हैं ? स्तंभ लेख से पता चलता है कि गोतम बुद्ध का जन्म स्थान लुमिनीं था! दरअसल गोतम बुद्ध का जन्म रास्ते में एक अनाम अर्थात बिना नाम के स्थान पर हुआ था , उनके जन्म लेने के बाद उस स्थान का नाम उनकी माँ के नाम पर उनकी याद में लुमिनीं रख दिया गया।  लुमिनीं गोतम बुद्ध की माँ का नाम था। यही लुमिनीं बाद में चलकर "रुम्मिनदेई " हो गया जिनकी पूजा उन लोगों द्वारा देई "देवी " के रूप में आज भी होती है।  रुम्मिनदेई और कुछ नहीं लुमिनीं (देवी ) का उत्तर रूप है। अतः गोतम बुद्ध की माँ का नाम लुमिनीं था महामाया या माया नाम बाद में जोड़ा हुआ है। 

ठीक ही कहा गया है कि इतिहास में यदि किसी की ख्याति की हत्या करनी हो तो उसका नोटिस लेना बन्द कर दीजिये। 

संस्कृत के कवि और लेखक कितने सावधान थे कि उन्होंने लुंबिनी , रुम्मिनदेई , कपिलवस्तु , उरुवेला , कुसिनारा जैसे बौद्ध स्थलों का पूरे संस्कृत साहित्य में एक बार भी नोटिस नहीं लिया है। ........

......... क्रमशः 


बुद्ध के साथ हमारी इस यात्रा में अभी थोड़ा सा विराम लेते हैं लेकिन बुद्ध के साथ हमारी ये यात्रा जारी रखेंगे।  जानकारियां और इतिहास को खंगालते रहेंगे और आप तक पहुंचाते रहेंगे। आगे के इतिहास को अगले ब्लॉग में यहीं से जारी रखेंगे। 


Source Books -

  • 'इतिहास का मुआयना' ( डॉ ० राजेंद्र प्रसाद सिंह )
  • 'बौद्ध धर्म : मोहनजोदड़ो हड़प्पा नगरों का धर्म' ( स्वपन कुमार विस्वास )
  • 'फाहियान की भारत यात्रा' ( फाहियान )
  • 'ह्वेनसांग की भारत यात्रा' ( ह्वेनसांग )
  • ' प्राचीन भारत का इतिहास और संस्कृति ' ( के ० सी ०  श्रीवास्तव )
  • Harappa.com 




 


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